Monday, December 22, 2014

गंगा को मलिन करके हम न केवल आत्महन्ता अपितु आत्मभक्षी भी बन रहे हैँ

प्रयाग का नाम आते ही ध्यान आता है-तीर्थराज प्रयाग, कल-कल प्रवाहित निर्मल गंगा। परन्तु इसके साथ ही तुरन्त ध्यान आता है कि गंगा की निर्मलता तो कल की बात थी आज तो गंगा के निर्मल प्रवाह को लगातार मलिन किया जा रहा है। नमामि गंगे गंगा को पुनः निर्मल बनाने का एक पुनीत प्रयास है। हमें आस है कि भारत सरकार का यह प्रयास सार्थक एवं सफल हो। गंगा को प्रदूषण ने एक दिन में नहीं डँसा है। यह शताब्दियों का दंश है जिसकी तीव्रता एवं विष लगातार बढ़ते हुये कालकूट बन रहा है। वस्तुतः गंगा का प्रदूषण भारतीय जनमानस के प्रदूषण की अभिव्यक्ति है, उसके विचार व व्यवहार  परिवर्तन की परिणति है। गंगा पवित्र थी उस भारतीय मानस के पवित्रता भाव से जहाँ 'गँगाजल सा निर्मल' उपमा बसती थी, गँगा जहाँ निर्मलता, पवित्रता व  वात्सल्य की कसौटी थी। आज वह प्रवाह मलिन है, मन्द है क्योकि हमारा मानस भी मलिन एवं स्वच्छन्द है, हम केवल अपने विषय में सोचते है। हमारा ध्येय सर्वकल्याण द्वारा आत्मकल्याण नहीं केवल आत्मकल्याण बन गया है। कृपण, स्वार्थी एवं दूषित हृदय से उदार, उदात्त और पवित्र कार्य नहीं होता। आज हम भले गंगा को माता कहते हैं शाब्दिक अभ्यासवश पर मन में उसके प्रति माँ का भाव नहीँ आता। उसके प्रति मातृवत् प्रेम एवं स्नेह नहीं उमड़ता। गँगा के निर्मलता हेतु आवश्यक है मानस की निर्मलता एवं पवित्रता। आवश्यक है कि अर्घ व आचमन के जल से कोई कुल्ला न करे। गंगा को मलिन करके हम न केवल आत्महन्ता अपितु आत्मभक्षी भी बन रहे हैँ।

Friday, December 5, 2014

सन्तो आई ’मित्रता’ की आँधी रे!

क्या बात है! आजकल जनता पार्टी "परिवार" एक होने जा रहा है। अरे! न केवल जा रहा है अपितु गले मिलने के लिये आकुल, आतुर है, छटपटा रहा है। अब न कोई समाजवादी पार्टी होगी, न  जनता दल यूनाटेड, न राष्ट्रीय जनता दल, न जनता दल (एस) , न इंडियन नेशनल लोकदल  और न कोई समाजवादी जनता पार्टी, अब बस एक "परिवार?" होगा जनता पार्टी। मुलायम, शरद यादव, नितीश, लालू, देवेगौडा, दुष्यंत चौटाला और कमल मोरारका परस्पर गले मिलने हेतु लपक रहे हैं। यही नहीं वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित किये जा रहे हैं तथा उसकी सम्भावनायें भी तलाशी जा रही हैं। आखिर कौन सी वह बात है जो इन सभी शत्रुता के अभिनेताओं  और शत्रुओं में इतना असीम प्रेमरस घोल रही है? यह सोचने की बात है भाई कि कल तक लालू को पानी पी-पीकर कोसने वाले नितीश और नितीश को पानी पी-पीकर गरियाने वाले लालू आज परस्पर स्वस्तिवाचन कर रहे हैं! कौन सा Unifying Factor  है जिसने दिलों की सारी कड़वाहट में मधुमिश्रित कर दिया? स्वाभाविक शत्रुओं और कलाबाजों की ऐसी अद्भुत मित्रता कभी-कभी देखने को मिलती है।
अरे नहीं ये स्वाभाविक कलाबाज ऐसे ही नहीं एक हुये हैं। आजकल एक ऐसी शक्ति इनके समक्ष आ खड़ी हुयी है जिससे ये सभी अपनी रंजिशे भूल एक रंग में रंगने को (दिखावा के लिये ही सही) विवश हो गये हैं। इनके समक्ष आसन्न अस्तित्त्व का संकट इन्हें एक-दूजे का खेवईया बनने को बाध्य कर रहा है। न चाहते हुये भी ये एक-दूसरे क जुआठा कांधे पर धरे हुये खेत जोतने के लिये तैयार हो रहे हैं। इन सबकी स्थिति बिलकुल वैसी ही हो गयी है जैसे रीतिकालीन कवि बिहारी के दोहों में चिरवैरी, स्वाभाविक शत्रुओं सर्प, मयूर, हिरण और बाघ की हो गयी थी-
कहलाने एकत बसत अहि, मयूर, मृग, बाघ ।
जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ, निदाघ ॥
भगवान् मार्तण्ड ने अपना तेज इतना प्रचण्ड किया कि ग्रीष्म ऋतु में प्रचण्ड ताप के अनुभव से पूरा जगत् तपोवन के समान सात्विकवृत्ति का हो गया और स्वाभाविक शत्रु एक ही स्थान पर अपनी शत्रुता छोड़कर एकत्रित हो गर्मी के दिन गिनने लगे। मयूर सर्प को खाने हेतु लपकता हुआ नहीं दिखा, बाघ हिरन का शिकार भूल गया।
आजकल भी प्रचण्ड तेज से अपना अस्तित्त्व बचाने की जुगत में ’जनता-जगत’ ’तपोवन’ सा हो रहा है।

Wednesday, December 3, 2014

ज्योतिष विज्ञान है, अन्धविश्वास नहीं ।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने विभिन्न चैनलों पर ज्योतिष-कार्यक्रम दिखाये जाने पर आपत्ति की है तथा ज्योतिष को अन्धविश्वास फैलाने वाला बताया है।
ज्योतिष वैदिक काल से गहन गणितीय एवं खगोलीय गणना पर आधरित ज्ञान की एक विधा है। ज्योतिष छः वेदाङ्गों में से एक वेदाङ्ग है। ज्योतिष को वेदपुरुष की आँख माना गया है। इतनी प्राचीन एवं दीर्घकाल से प्रवर्तित, समाज में वेष्ठित और जन-मन में अनुस्यूत विद्या को क्षण भर में अंधविश्वास बता देना अज्ञानता का बोधक है तथा साथ ही साथ इस बात से दुराग्रह, द्वेष एवं षड्यन्त्र भी व्यक्त होता है।
ज्योतिष विज्ञान है। उसकी गणनाओं में वैज्ञानिकता है। विश्वास और अविश्वास व्यक्ति का व्यक्तिगत प्रश्न है परन्तु किसी के विश्वास पर कुठाराघात करना एवम् उसे सरासर अन्धविश्वास बता देना बोना किसी विशेष अध्ययन एवम् वस्तुस्थिति जाने न केवल अन्याय है अपितु अपराध भी है।
भारत में एक समय था जब न्यायालयों के न्यायाधीश अथवा वे लोग जिनको किसी विषय पर निर्णय देना होता था, पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष, अर्थात् दोनों पक्षों का ज्ञान प्राप्त करते थे, तब कोई निर्णय देते थे। एक गलत निर्णय न केवल वर्तमान को प्रभावित करता है अपितु भविष्य को भी नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। न्यायाधीशों को कोई निर्णय देने से पहले कम से कम कुछ संस्कृत और ज्योतिष अवश्य पढ़नी चाहिये अथवा योग्य विद्वानों से सम्पर्क अवश्य करना चाहिये। ज्योतिष कभी अपना ज्ञान किसी पर थोपता नहीं अपितु जनविश्वास अर्जित करता है। इसी विश्वासार्जन का परिणाम है कि विभिन्न कालानुक्रमों में अनगिनत आक्रमण एवम् आघात सहकर भी आज यह विद्या जीवित है...केवल पुस्तकों एवं ग्रन्थों में नहीं अपितु जन-मन में एवं जन-विश्वास में। इस विश्वास पर लात मारना इतना सहज विषय नहीं है। आज
के उच्च न्यायालय से पहले भी अनेक लोग और शासक ऐसा कर चुके हैं और सभी को मुँह की खानी पड़ी है।
सदियों से प्रायोगिक विद्या को क्षण में अन्धविश्वास कह देना एक क्रूर मजाक है। विश्वास और अन्धविश्वास के मध्य अन्तर को समझना बहुत आवश्यक है। ज्योतिष कभी अन्धश्रद्धा और अन्धविश्वास को बढ़ावा नहीं देता और न ही यह कहता है कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहो, सब कुछ तुम्हारे पास आयेगा। हाँ यह बात अवश्य सत्य है कि ज्योतिष विद्या की कुछ लोग दुकान खोलकर अवश्य बैठ गये हैं जिनको इसक रञ्चमात्र भी ज्ञान नहीं है। ऐसे ढोंगियों, आडम्बरियों को पहचानना आज की आवश्यकता है। चन्द ढोंगियों के ढोंग की ओट में न्यायालय समस्त ज्ञान-सम्पदा को ढोंग और आडम्बर नहीं बता सकता।
ज्योतिष के भग्नावशेष देखने की इच्छा रखने वालों के मंसूबे कभी पूरे नहीं होंगे।

नक्सल आतंकवाद-कायर नक्सली

सुकमा में नक्सली आतंकवादियों द्वारा ग्रामीणों की ओट लेकर सीआरपीएफ के जवानों की हत्या बहुत ही कायरतापूर्ण कदम है। नक्सल आन्दोलन सदा से ही हिंसक और कायरतापूर्ण रहा है। कभी भी नक्सलियों ने एक सृजन नहीं किया, बस उजाड़ा है घरों, खेतों, सड़कों, पगड़न्डियों, विद्यालयों, बहनों की माँगों और माताओं की गोद को। भारत में नक्सल आतंकवाद जिस विचारधारा की कोख से पैदा हुआ, वह विचारधारा वस्तुतः शब्दों में जितनी लुभावनी और सुन्दर है, यथार्थ के धरातल पर उतनी की विकृत, हिंसक, बर्बर, भयानक, रक्तरंजित और अमानवीय है। हत्या, लूट, आतंक आदि उसके सहज अस्त्र हैं। वामपन्थ के इतिहास पर यदि हम दृष्टिपाअत करें तो स्तालिन, माओ, पॉल पोट से लेकर भारत के सामयवादी नम्बूदरीपाद, नायर, ज्योति बसु, बुद्धदेव, मानिक सरकार तक सभी ने किसी न किसी रूप में आतंक, हिंसा और भय का सहारा लिया है। साम्यवादी आतंकवाद का ही नाम नक्सलवाद है। साम्यवाअदियों ने स्वयं शक्ति अर्जित करने और अपने शक्ति को बनाये रखने के लिये vampire की तरह गरीब, शोषित, पीड़ित, भोलीभाली जनता का रक्त चूसा है और जीवन प्राप्त किया है। 
नक्सली आतंक के मास्टरमाइंड चारू मजूमदार ने कहा था कि "जो पारम्परिक शत्रु के रक्त में अपना हाथ नहीं डुबाता, वह क्रान्तिकारी नहीं है।" इन नक्सलियों की भारतदेश से पारम्परिक शत्रुता है, क्योंकि ये अपने आकाओं द्वारा पाले-पोसे और भारत में रोपे गये विष हैं। आज सरकार को इस बात को समझना होगा और इनके साथ कठोरता से पेश आना होगा। ये नक्सल-आतंकवादी न क्षमा के पात्र हैं न दया के अपितु ये भोलेभाली वनवासी जनता के खून से जमीन को रंगते हुये अपना उल्लू सीधा करने वाले राष्ट्रद्रोही भेड़िये हैं, जो किसी सहानुभूति के हकदार नहीं। 
सरकार को इन नक्सल-आतंकवादियों के आतंक को समाप्त करने हेतु इनके उजले मुखौटों, देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में छिपे इनके मास्टरमाइंडों तथा तथाकथित मानवाधिकारवादियों, जिनकी आँखें केवल इन्हीं के लिये नम होती हैं, पर नकेल कसने की जरूरत है। इस नक्सल-आतंकी विषबेलि की एक अदृश्य जड़ नगरों में आसन जमाये है, वहाँ उसे खोज-खोजकर उबलते पानी से सींचने की जरूरत है।