Saturday, April 19, 2014

हमारे देश में तिरस्कृत दो आधारभूत तत्त्व-गृहिणी एवं कृषक

हमारे देश में दो आधारभूत तत्त्वों को गम्भीर रूप से उपेक्षित रखा गया है। प्रथम गृहिणी (House Wife) और द्वितीय
कृषि एवं किसान (Agriculture and farmer)। ये दोनों ही तत्त्व परिवार, समाज एवं राष्ट्र की आधारशिला हैं। आज दोनों की स्थिति विडम्बनीय है। स्वतन्त्रता के पश्चात् इन दोनों के विकास एवं प्रतिष्ठा के प्रति सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिये था, परन्तु आज तक दोनों क्षेत्र अत्यन्त उपेक्षित हैं। जिस प्रकार वर्तमान समाज में ’गृहिणी’ (House Wife) शब्द अपनी गरिमा खो चुका है और कहीं न कहीं हीनता का द्योतक माना जाने लगा है उसी प्रकार हमारे देश में ’किसान’ शब्द भी अपनी गरिमा से स्खलित होकर हीनताबोधक बन गया है। ऐसा नहीं है कि इन शब्दों ने अथवा इनसे द्योतित अर्थों ने स्वयं इस स्थिति का चयन किया है। इन्होंने इसका चयन कदापि नहीं किया है। हमारे देश का तथाकथित विकास और तथाकथित ’सभ्यता’ की परिभाषा इनकी इस दुर्गति का कारण है। जहाँ मिट्टी से जुड़ी हर बात गौण एवं निम्नस्तरीय समझी जाती है, भले ही पेट की आग बिना मिट्टी की सोधीं सुगन्ध के न बुझती हो। आज इन दोनों शब्दों, दोनों सम्बोधनों के हीन एवं तिरस्कृत स्थिति का परिणाम परिवार, समाज एवं देश भोग रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आज स्वतन्त्रता के छः दशक व्यतीत हो जाने पर भी हमारे देश के नीति-नियन्ताओं एवं वर्तमान तथा भावी कर्णधारों को इन आधाअरभूत तत्वों पर दृष्टिपात करने एवम् इनकी गरिमामय उपस्थिति व स्थिति सुनिश्चित करवाने की तनिक भी चिन्ता नहीं है। ऐसे में देश को तो रसातल में जाना ही है। जब भी कोई देश अपने आधार की अनदेखी करता है तब उसे उसका भारी मूल्य चुकाना पड़ता है। भारत का इतिहास ऐसे उद्धरणों से भरा पड़ा है कि जब-जब अति आवश्यक तत्त्वों एवम् विशेषताओं की स्थिति दुर्बल हुयी है, देश दुर्बल हुआ है, पराजित हुआ है, परास्त हुआ, परतन्त्र हुआ है। फिर पीढ़ियों ने एक संघर्षगाथा लिखकर स्थिति-परिवर्तन किया है। मात्र शब्दों की अट्टालिका खड़ा करने एवं वार्ताओं  की झड़ी लगाने से देश न चलता है और न ही चल सकता है। ऐसा करके देश को स्थिर एवं स्थापित करने का सपना देखने वालों का सपना ताश के पत्तों एवं बालुकाभित्ति सा एक क्षीण वायु के हिलोर से ढह जायेगा।

आज स्थिति यह है कि बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे जो अपनी माँ को ’गृहिणी’ (House Wife) बताना पसन्द करते हैं। जब किसी युवा से यह प्रश्न किया जाता है कि आपकी माँ क्या करती हैं? तो अनेक प्रकार के उत्तर अनेक प्रकार की ऊर्जा के साथ आते हैं। यदि किसी की माँ डॉक्टर, इन्जीनियर, प्रोफेसर, शिक्षिका अथवा कोई अधिकारी है, तो तपाक से बहुत जोश के साथ उत्तर मिलता है कि मेरी माँ अमुक अधिकारी हैं आदि आदि। परन्तु यदि किसी की माँ इन सबसे इतर गृहिणी है और अपना पूरा समय घर-परिवार की संस्कारशाला से लेकर पाकशाला तक के सुसज्जन एवम् सुव्यवस्थापन में व्यतीत करती है, तो उत्तर आता है कि ’मेरी माँ कुछ नहीं करती, ‘House wife’ हैं, बहुत ही दबे स्वर में। ऐसा सुनकर सामने वाला भी धीरे से हुँकारी भरता है। अब सोचिये भला कितनी दयनीय एवं शोचनीय स्थिति है? इस स्थिति की समीक्षा होना अति आवश्यक है। ऐसी ही सम्मनरहित स्थिति के कारण आज कोई भी लड़की गृहिणी बनकर जीवन-निर्वाह नहीं करना चाहती। और चाहे भी क्यो जब उस स्थिति में अपेक्षित सम्मान एवं प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त होती। यही कारण है कि आज स्त्रियों को स्वयं स्थापित होंने के लिये घर से बाहर इच्छा-अनिच्छापूर्वक काम करना पड़ता है और साथ ही साथ घर भी सम्हालना पड़ता है। इस प्रकार उसे दोगुने से अधिक भार वहन करना पड़ता है। प्रश्न यह है कि क्या ’काम करने’ की परिभाषा घर के बाहर ही जो कुछ किया जाता है या जा सकता है वहीं तक सीमित है? क्या घर में किया जाने वाला कार्य काम की श्रेणी में नहीं आता? क्या जिस कार्य के घण्टे तय हैं एवम् जिसके लिये एक कार्यालय भवन बना हुआ है, वही कार्य कहा जा सकता है, और उसी कार्य को करनेवाला कामकाजी कहा जा सकता है? घर में काम करना, पूरे दिन घर सँवारना, गेहूँ पिसाने से लेकर आँतों की पाचन-प्रक्रिया तक की चिन्ता करना, यह काम नहीं है? यदि यह काम नहीं है तो यह प्रक्रिया किस श्रेणी में आती है? इस कार्य का कोई मूल्य नहीं आँका जाता और जब चाहे जिसका मन हो कहता फिरता है कि “तुम तो दिनभर घर पर ही रहती हो, तुम्हारा क्या काम है, क्या करती हो?” यह कहते समय सम्भवतः लोगों को उस स्थिति की कल्पना ही नहीं होती कि एक व्यवस्था स्थापित करने में कितना श्रम और समर्पण लगता है। आज सम्भवतः जो लोग महानगरीय जीवन जी रहे हैं, और पति-पत्नी दोनों बाहर काम करते हैं, कुछ सीमा तक इस बात को समझ सकते हैं कि घर सम्हालना एवम् उचित भोजन-व्यवस्था बनाये रखना वास्तव में कितना चुनौतीपूर्ण कार्य है? शब्दों का मर्म समझना बहुत आवश्यक है। और शब्द प्रयोग करते समय उसके अर्थ की सीमाओं एवम् विस्तार पर भी ध्यान देना अपरिहार्य है। मुझे लगता है कि ’कामकाजी’ शब्द को अब पुनर्परिभाषित करने का समय आ गया है। एक गृहिणी द्वारा किया गया व्यवस्थापन संसार का सर्वश्रेष्ठ व्यवस्थापन है विना किसी एमबीए स्कूल में गये। अतः एक गृहिणी की शक्ति, कुशलता एवं उसके समर्पण को समाज एवं शासन दोनों उपेक्षित करना बन्द करें एवं उसकी प्रतिष्ठा वापस लाने हेतु आवश्यक पहल करें अन्यथा इसका दीर्घकालीन परिणाम भुगतने के लिये तैयार हो जायें।
गृहिणी की भाँति कृषि और कृषक भी इस देश में उपेक्षित जीवन जी रहा है। उसके लिये अपेक्षित सम्मान का नितान्त अभाव है। यही कारण है कि आज देश में कोई स्वयं को किसान नहीं कहना चाहता। खेती पार्टटाइम व्यवसाय का विषय बन गयी है। जब जेठ महीने में बहाये गये श्रमसीकर का कोई मूल्य नहीं है तो भला कोई क्यों पसीना बहाये? आज किसान आत्महत्या करने को विवश हैं। इसी से पता चलता है कि स्थिति कितनी दयनीय है? संसार में भोग एवम् ऐश्वर्य कि चाहे कितनी भी वस्तुये हो जायँ पर जठराग्नि अन्न से ही बुझेगी। इसीलिये शास्त्रों में अन्न को ’अन्न देवोभव’ कहा गया है। इतना सम्माननीय स्थान इसे यो ही नहीं प्रदान किया गया है अपितु इसके अकाट्य विशेषता के कारण इसे ऐसा स्थान मिला है। आज उसी अन्नदेव का उत्पादन करने वाला कृष्क घोर उपेक्षा का शिकार है। कोई उससे बात तक नहीं पूछने वाला। ऋण के बोझ के तले दबा वह कराह रहा है। कोई आह तक सुनने वाला नहीं है। जब भी कभी उसकी पीड़ा और चीत्कार सामने आती है तो राजनेताओं द्वारा उस पर गार ही उड़ेला जाता है दर्द हरने के नाम पर। खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं। खेती हतोत्साहित होने से पशुपालन स्वतः हतोत्साहित होता है। हमारे देश में किसान उपेक्षित, कृषि हतोत्साहित है तो पशुपालन भी खतरे में है। कुपोषण पर बहुत चर्चायेम् होती हैं, गोष्ठियाँ होती है तथा महान् चिन्ता व्यक्त की जाती है। परन्तु दुःख और आश्चर्य इस बात का है कि ग्राफ दिखा-दिखाकर विलाप करने वाले लोग उसके वास्तविक समाधान की ओर देखना तक नहीं चाहते।
जिस प्रकार यह एक अकाट्य सार्वभौमिक, सार्वकालिक सत्य है कि कृषि ही मानवता का आधार है, उसी प्रकार यह भी एक चिरसत्य है कि कृषि सबसे जोखिम भरा व्यवसाय है। पञ्चतन्त्र में विष्णुशर्मा ने राजकुमारों को शिक्षित करने के प्रसंग में सर्वप्रथम इसी बात की शिक्षा दी थी कि कौन सा व्यवसाय किस प्रकृति तथा किस प्रकार के लाभ-हानि वाला है। वहाँ उन्होंने कृषि को सर्वाधिक जोखिमपूर्ण बताया है। आज भी यह बात उसी प्रकार सत्य है। भारतीय कृषि जिसके विषय में कहा जाता है कि यह मानसून का जुआ है, उस पर तो यह जोखिम का सिद्धान्त सर्वाधिक लागू होता है। ऐसे में हमारे किसानों को सब्सिडी क्यों नहीं चाहिये? शासन इस बात की चिन्ता क्यों नहीं करता कि हमारे किसान सुखी-समृद्ध कैसे हों? कुपोषण समाप्त करने के लिये दूध एक प्रमुख आहार है । यदि पशुपालन सम्यक् नहीं होगा तो दूध क्या आकाश से बरसेगा या धरती फूटकर निकलेगा। पशुपालन को सुदृढ़ करना ही दूध की कमी पूरा करने का एकमात्र समाधान है। यदि कृषि और पशपालन पर हमारे देश में ध्यान नहीं दिया गया तो हम इन दोनों क्षेत्रों में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भिखमंगे के समाज अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोप के आगे अपना आँचल फैलाये रहेंगे अथवा इसका कुछ सिंथेटिक समाधान ढूँढना पड़ेगा, जो असम्भव है। आज तक विज्ञान किसी भी मूलतत्त्व की सृष्टि नहीं कर पाया है। अमेरिका और यूरोप की हार्दिक इच्छा यही है कि भारत की परम्परागत कृषि और पशुपालन पद्धतियाँ इतनी हतोत्साहित हो जायें कि कोई भी इस क्षेत्र में जाना ही न चाहे और इस प्रकार बढ़ी हुयी माँग घरेलू उत्पादन से पूरी न हो पाने पर भारत इन वस्तुओं एवम् उत्पादों को उनसे आयात करे। इस प्रकार भारत उनके लिये एक बड़ा बाजार सिद्ध हो।

किसान को उचित सहायता देकर, उसके श्रम को उचित सम्मान देकर, उसकी गरिमा की पुनर्प्रतिष्ठा आवश्यक है। समाज एवं देश के संतुलित विकास के लिये गृहिणी के योगदान को रेखांकित करते हुये उसका सम्मान सुनिश्चित करना ही होगा । किसानों एवं पशुपालकों के श्रम एवं समाज के प्रति इनके योगदान को बताते हुये, इन्हें सशक्त बनाना आज के समय की अपरिहार्य आवश्यकता है। ये दोनों किसी भी समाज की जड़ हैं, आधारभूत तत्त्व हैं। कोई भवन अथवा समाज दोनों आधार से ही शक्तिशाली और  दुर्बल होता है। अतः इन आधारभूत तत्वों पर गम्भीरता से ध्यान दिया जाना चाहिये ताकि देश का समावेशी एवं समेकित विकास हो सके और वास्तव में एक विकसित देश का हमारा सपना पूरा हो सके विना अपनी मौलिकता को विनष्ट किये। घर एवं जीवन  सँवरता है गृहिणी से और समाज तथा देश सँवरता है किसान से।

Tuesday, April 15, 2014

मोदी जी ने ठीक ही तो कहा राहुल को बच्चा

मोदी जी द्वारा राहुल माइनो के लिये ’बच्चा’ सम्बोधन सटीक एवं उपयुक्त है। इससे मोदी जी का शब्दसामर्थ्य पता चलता है। ’बाल’ /’वत्स’ जिसका अपभ्रंश रूप ’बच्चा’ है, उनके लिये भी प्रयुक्त होता है, जो किसी विषय, विधा अथवा शास्त्र में अनभिज्ञ हों अथवा उसके विषय में जानकारी प्राप्त करने की शुरुआत कर रहे हों। जैसे यदि कोई व्यक्ति ’जर्मन’ भाषा सीखना प्रारम्भ करता है तो वह ’जर्मन’ भाषा के लिये ’बच्चा’ ही होगा। यद्यपि राहुल ’आयुवृद्ध’ हैं परन्तु यह बात भी सत्य है कि वे ’ज्ञान-बाल’ हैं। ’अनुभव-बाल’ भी उनको कहा जा सकता है। राजनीति में मुख्यतः तीन प्रकार के पौधे होते हैं- (१)जंगल में स्वयं के लिये संघर्ष करके उगे देवदार, (२) गमले में किसी के द्वारा रोपे एवं संरक्षित किये गया सजावटी गेंदा (गेंदा इसलिये कि इसमें अपना कुछ एण्टीबैक्टीरियल गुण तो होता है। यद्यपि दूसरों के हाथों रोपे जाते हैं) (३) ग्रीन हाउस में गम्भीर संरक्षण (ICU) में पले-बढ़े पौधे, जिनको वह धूप भी कुम्हला देती है, जिसके लिये ’देवदार’ संघर्ष करते हैं। राहुल गाँधी तीसरी कोटि के पौधे हैं। हम सभी जानते हैं कि ग्रीन हाउस की उपज कितनी क्षणिक एवं कितनी बालसुलभ, कितनी कोमल होती है। आत्मविकास की तो वहाँ तनिक बात तक नहीं होती। क्या हार्मोन कैसे डाला जायेगा ये वैज्ञानिक और किसान तय करते हैं । फसल कैसी होगी, पौधा कैसे बढ़ेगा, कब कितना उत्पादन करेगा यह भी पूर्वानुमानित और तय होता है। सभी सुख-सुविधायें व एशोआराम के बीच पले ग्रीनहाउस के पौधे हमेशा ’बाल’ बने रहते हैं, यही इनकी खासियत है । जिसके कारण बाजार के वर्ग-विशेष में इनकी माँग बनी रहती है। खैर...ठीक ही तो कहा महोदय अभी ’बच्चे’ हैं, फिर इतनी तिलमिलाहत क्यों? यदि इतनी तिलमिलाहट ही है, तो आखिर ’युवा’ कहने पर तमतमाहट क्यों नहीं? जबकि युवा की राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय तय आयुसीमा के अन्तर्गत भी राहुल नहीं आते। तो फिर राहुल को ’वृद्ध’ क्यों न कहा जाय? यदि सब पर उनके और उनके अनुयायियों को आपत्ति है, तो क्या नयी श्रेणी गढ़ी जाय, जिसमें नेहरू-खान-माइनो-"गांधी" परिवार का एकाधिकार हो, जिसे दिल्ली के श्मशानों पर।

Friday, April 11, 2014

मुलायम के कलुषित हृदय को उजागर करने वाली धन्य है तू जिह्वा...

कहते हैं कि दिल की बात जुबान पर आ ही जाती है। आखिर मुलायम सिंह दिल की बात निकालने को उतावली अपनी मचलती रसना (जीभ) को भला कब तक रोक पाते? अपनी जीभ से तलवार चलाने में माहिर समाजवादी पार्टी के "समाजवादी" नेता जी के मुँह से उनकी असलियत तो निकलनी ही थी, सो निकल गयी। समाजवादी पार्टी विषवमन और समाज में विषवपन के लिये प्रसिद्ध है ही। आखिर विष के बीज बो-बो कर उसकी पार्टी सत्ता में जो आती है। अब भला अपना चरित्र कैसे छोड़ दे? जो लोग आजम खाँ की विषाक्त जिह्वा से आश्चर्यचकित थे, उन्हें अब पता चल गया होगा कि उसकी कैंची जैसी जीभ को बल कहाँ से मिलता है। आज ’जैसा राजा वैसी प्रजा’ कहावत भले न सही हो पर ’जैसा मुखिया वैसे घरवाले’ ये कहावत चरितार्थ हो गयी। मुलायम ने समाज में वैमनस्य फैलाने वाली बेलगाम जुबानों पर कभी लगाम लगाने की कोशिश नहीं की, क्योंकि ये तो उन्हीं के द्वारा इसी विषवमन के लिये रोपे गये पौधे थे। आज उन्हीं मुलायम की स्त्रियों के प्रति घटिया एवं अपराधियों के प्रति उदात्त भावना देखकर मुझे कदापि आश्चर्य नहीं हो रहा है। उत्तरप्रदेश के हर नागरिक को, जो मुलायम का क्रीतदास नहीं है, उसे यह बात स्पष्टरूप से पता है कि अपराधियों को पाल-पाल कर ही सपा सत्ता में पहुँचती रही है और इस बार भी पहुँची है। वह अपराध चाहे हत्या, डकैती, लूट, अपहरण जैसी गुण्डागर्दी हो या बलात्कार जैसे जघन्य कृत्य...सभी अपराधियों के लिये मुलायम की मुलायम तकिया अच्छी पनाहगाह एवं स्वप्नगाह है। ऐसे व्यक्ति या ऐसे ’समाजवाद’ के ढोंगियों को अपना अमूल्य मत देते समय एक बार तो अवश्य सोचना चाहिये। इसबार के चुनाव में सकारात्मक बात यह है कि अब हमारे देश की जनता ने सोचना-विचारना शुरू कर दिया है। जिन महिलाओं के प्रति मुलायम ने इतना घृणित बयान दिया है, उस महिलावर्ग ने भी अपने अधिकारों को पहचानना प्रारम्भ कर दिया है और दिल्ली में कल हुआ मतदान इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है। अच्छा है मुलायम न सही धन्यवाद उनकी चञ्चल एवं सजग जिह्वा को जिसने उनके काले हृदय की बात को समाज के सामने प्रस्तुत कर कम से कम अपने Gender के साथ justice तो किया। (NOTE:-जिह्वा, रसना आदि जीभ के पर्यायवाची शब्द स्त्रीलिंग हैं, अतः जीभ बेचारी कब तक अपने सहधर्मियों के साथ अन्याय सह सकती थी...जिह्वा तू धन्य है।)