Monday, December 22, 2014

गंगा को मलिन करके हम न केवल आत्महन्ता अपितु आत्मभक्षी भी बन रहे हैँ

प्रयाग का नाम आते ही ध्यान आता है-तीर्थराज प्रयाग, कल-कल प्रवाहित निर्मल गंगा। परन्तु इसके साथ ही तुरन्त ध्यान आता है कि गंगा की निर्मलता तो कल की बात थी आज तो गंगा के निर्मल प्रवाह को लगातार मलिन किया जा रहा है। नमामि गंगे गंगा को पुनः निर्मल बनाने का एक पुनीत प्रयास है। हमें आस है कि भारत सरकार का यह प्रयास सार्थक एवं सफल हो। गंगा को प्रदूषण ने एक दिन में नहीं डँसा है। यह शताब्दियों का दंश है जिसकी तीव्रता एवं विष लगातार बढ़ते हुये कालकूट बन रहा है। वस्तुतः गंगा का प्रदूषण भारतीय जनमानस के प्रदूषण की अभिव्यक्ति है, उसके विचार व व्यवहार  परिवर्तन की परिणति है। गंगा पवित्र थी उस भारतीय मानस के पवित्रता भाव से जहाँ 'गँगाजल सा निर्मल' उपमा बसती थी, गँगा जहाँ निर्मलता, पवित्रता व  वात्सल्य की कसौटी थी। आज वह प्रवाह मलिन है, मन्द है क्योकि हमारा मानस भी मलिन एवं स्वच्छन्द है, हम केवल अपने विषय में सोचते है। हमारा ध्येय सर्वकल्याण द्वारा आत्मकल्याण नहीं केवल आत्मकल्याण बन गया है। कृपण, स्वार्थी एवं दूषित हृदय से उदार, उदात्त और पवित्र कार्य नहीं होता। आज हम भले गंगा को माता कहते हैं शाब्दिक अभ्यासवश पर मन में उसके प्रति माँ का भाव नहीँ आता। उसके प्रति मातृवत् प्रेम एवं स्नेह नहीं उमड़ता। गँगा के निर्मलता हेतु आवश्यक है मानस की निर्मलता एवं पवित्रता। आवश्यक है कि अर्घ व आचमन के जल से कोई कुल्ला न करे। गंगा को मलिन करके हम न केवल आत्महन्ता अपितु आत्मभक्षी भी बन रहे हैँ।

Friday, December 5, 2014

सन्तो आई ’मित्रता’ की आँधी रे!

क्या बात है! आजकल जनता पार्टी "परिवार" एक होने जा रहा है। अरे! न केवल जा रहा है अपितु गले मिलने के लिये आकुल, आतुर है, छटपटा रहा है। अब न कोई समाजवादी पार्टी होगी, न  जनता दल यूनाटेड, न राष्ट्रीय जनता दल, न जनता दल (एस) , न इंडियन नेशनल लोकदल  और न कोई समाजवादी जनता पार्टी, अब बस एक "परिवार?" होगा जनता पार्टी। मुलायम, शरद यादव, नितीश, लालू, देवेगौडा, दुष्यंत चौटाला और कमल मोरारका परस्पर गले मिलने हेतु लपक रहे हैं। यही नहीं वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित किये जा रहे हैं तथा उसकी सम्भावनायें भी तलाशी जा रही हैं। आखिर कौन सी वह बात है जो इन सभी शत्रुता के अभिनेताओं  और शत्रुओं में इतना असीम प्रेमरस घोल रही है? यह सोचने की बात है भाई कि कल तक लालू को पानी पी-पीकर कोसने वाले नितीश और नितीश को पानी पी-पीकर गरियाने वाले लालू आज परस्पर स्वस्तिवाचन कर रहे हैं! कौन सा Unifying Factor  है जिसने दिलों की सारी कड़वाहट में मधुमिश्रित कर दिया? स्वाभाविक शत्रुओं और कलाबाजों की ऐसी अद्भुत मित्रता कभी-कभी देखने को मिलती है।
अरे नहीं ये स्वाभाविक कलाबाज ऐसे ही नहीं एक हुये हैं। आजकल एक ऐसी शक्ति इनके समक्ष आ खड़ी हुयी है जिससे ये सभी अपनी रंजिशे भूल एक रंग में रंगने को (दिखावा के लिये ही सही) विवश हो गये हैं। इनके समक्ष आसन्न अस्तित्त्व का संकट इन्हें एक-दूजे का खेवईया बनने को बाध्य कर रहा है। न चाहते हुये भी ये एक-दूसरे क जुआठा कांधे पर धरे हुये खेत जोतने के लिये तैयार हो रहे हैं। इन सबकी स्थिति बिलकुल वैसी ही हो गयी है जैसे रीतिकालीन कवि बिहारी के दोहों में चिरवैरी, स्वाभाविक शत्रुओं सर्प, मयूर, हिरण और बाघ की हो गयी थी-
कहलाने एकत बसत अहि, मयूर, मृग, बाघ ।
जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ, निदाघ ॥
भगवान् मार्तण्ड ने अपना तेज इतना प्रचण्ड किया कि ग्रीष्म ऋतु में प्रचण्ड ताप के अनुभव से पूरा जगत् तपोवन के समान सात्विकवृत्ति का हो गया और स्वाभाविक शत्रु एक ही स्थान पर अपनी शत्रुता छोड़कर एकत्रित हो गर्मी के दिन गिनने लगे। मयूर सर्प को खाने हेतु लपकता हुआ नहीं दिखा, बाघ हिरन का शिकार भूल गया।
आजकल भी प्रचण्ड तेज से अपना अस्तित्त्व बचाने की जुगत में ’जनता-जगत’ ’तपोवन’ सा हो रहा है।

Wednesday, December 3, 2014

ज्योतिष विज्ञान है, अन्धविश्वास नहीं ।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने विभिन्न चैनलों पर ज्योतिष-कार्यक्रम दिखाये जाने पर आपत्ति की है तथा ज्योतिष को अन्धविश्वास फैलाने वाला बताया है।
ज्योतिष वैदिक काल से गहन गणितीय एवं खगोलीय गणना पर आधरित ज्ञान की एक विधा है। ज्योतिष छः वेदाङ्गों में से एक वेदाङ्ग है। ज्योतिष को वेदपुरुष की आँख माना गया है। इतनी प्राचीन एवं दीर्घकाल से प्रवर्तित, समाज में वेष्ठित और जन-मन में अनुस्यूत विद्या को क्षण भर में अंधविश्वास बता देना अज्ञानता का बोधक है तथा साथ ही साथ इस बात से दुराग्रह, द्वेष एवं षड्यन्त्र भी व्यक्त होता है।
ज्योतिष विज्ञान है। उसकी गणनाओं में वैज्ञानिकता है। विश्वास और अविश्वास व्यक्ति का व्यक्तिगत प्रश्न है परन्तु किसी के विश्वास पर कुठाराघात करना एवम् उसे सरासर अन्धविश्वास बता देना बोना किसी विशेष अध्ययन एवम् वस्तुस्थिति जाने न केवल अन्याय है अपितु अपराध भी है।
भारत में एक समय था जब न्यायालयों के न्यायाधीश अथवा वे लोग जिनको किसी विषय पर निर्णय देना होता था, पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष, अर्थात् दोनों पक्षों का ज्ञान प्राप्त करते थे, तब कोई निर्णय देते थे। एक गलत निर्णय न केवल वर्तमान को प्रभावित करता है अपितु भविष्य को भी नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। न्यायाधीशों को कोई निर्णय देने से पहले कम से कम कुछ संस्कृत और ज्योतिष अवश्य पढ़नी चाहिये अथवा योग्य विद्वानों से सम्पर्क अवश्य करना चाहिये। ज्योतिष कभी अपना ज्ञान किसी पर थोपता नहीं अपितु जनविश्वास अर्जित करता है। इसी विश्वासार्जन का परिणाम है कि विभिन्न कालानुक्रमों में अनगिनत आक्रमण एवम् आघात सहकर भी आज यह विद्या जीवित है...केवल पुस्तकों एवं ग्रन्थों में नहीं अपितु जन-मन में एवं जन-विश्वास में। इस विश्वास पर लात मारना इतना सहज विषय नहीं है। आज
के उच्च न्यायालय से पहले भी अनेक लोग और शासक ऐसा कर चुके हैं और सभी को मुँह की खानी पड़ी है।
सदियों से प्रायोगिक विद्या को क्षण में अन्धविश्वास कह देना एक क्रूर मजाक है। विश्वास और अन्धविश्वास के मध्य अन्तर को समझना बहुत आवश्यक है। ज्योतिष कभी अन्धश्रद्धा और अन्धविश्वास को बढ़ावा नहीं देता और न ही यह कहता है कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहो, सब कुछ तुम्हारे पास आयेगा। हाँ यह बात अवश्य सत्य है कि ज्योतिष विद्या की कुछ लोग दुकान खोलकर अवश्य बैठ गये हैं जिनको इसक रञ्चमात्र भी ज्ञान नहीं है। ऐसे ढोंगियों, आडम्बरियों को पहचानना आज की आवश्यकता है। चन्द ढोंगियों के ढोंग की ओट में न्यायालय समस्त ज्ञान-सम्पदा को ढोंग और आडम्बर नहीं बता सकता।
ज्योतिष के भग्नावशेष देखने की इच्छा रखने वालों के मंसूबे कभी पूरे नहीं होंगे।

नक्सल आतंकवाद-कायर नक्सली

सुकमा में नक्सली आतंकवादियों द्वारा ग्रामीणों की ओट लेकर सीआरपीएफ के जवानों की हत्या बहुत ही कायरतापूर्ण कदम है। नक्सल आन्दोलन सदा से ही हिंसक और कायरतापूर्ण रहा है। कभी भी नक्सलियों ने एक सृजन नहीं किया, बस उजाड़ा है घरों, खेतों, सड़कों, पगड़न्डियों, विद्यालयों, बहनों की माँगों और माताओं की गोद को। भारत में नक्सल आतंकवाद जिस विचारधारा की कोख से पैदा हुआ, वह विचारधारा वस्तुतः शब्दों में जितनी लुभावनी और सुन्दर है, यथार्थ के धरातल पर उतनी की विकृत, हिंसक, बर्बर, भयानक, रक्तरंजित और अमानवीय है। हत्या, लूट, आतंक आदि उसके सहज अस्त्र हैं। वामपन्थ के इतिहास पर यदि हम दृष्टिपाअत करें तो स्तालिन, माओ, पॉल पोट से लेकर भारत के सामयवादी नम्बूदरीपाद, नायर, ज्योति बसु, बुद्धदेव, मानिक सरकार तक सभी ने किसी न किसी रूप में आतंक, हिंसा और भय का सहारा लिया है। साम्यवादी आतंकवाद का ही नाम नक्सलवाद है। साम्यवाअदियों ने स्वयं शक्ति अर्जित करने और अपने शक्ति को बनाये रखने के लिये vampire की तरह गरीब, शोषित, पीड़ित, भोलीभाली जनता का रक्त चूसा है और जीवन प्राप्त किया है। 
नक्सली आतंक के मास्टरमाइंड चारू मजूमदार ने कहा था कि "जो पारम्परिक शत्रु के रक्त में अपना हाथ नहीं डुबाता, वह क्रान्तिकारी नहीं है।" इन नक्सलियों की भारतदेश से पारम्परिक शत्रुता है, क्योंकि ये अपने आकाओं द्वारा पाले-पोसे और भारत में रोपे गये विष हैं। आज सरकार को इस बात को समझना होगा और इनके साथ कठोरता से पेश आना होगा। ये नक्सल-आतंकवादी न क्षमा के पात्र हैं न दया के अपितु ये भोलेभाली वनवासी जनता के खून से जमीन को रंगते हुये अपना उल्लू सीधा करने वाले राष्ट्रद्रोही भेड़िये हैं, जो किसी सहानुभूति के हकदार नहीं। 
सरकार को इन नक्सल-आतंकवादियों के आतंक को समाप्त करने हेतु इनके उजले मुखौटों, देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में छिपे इनके मास्टरमाइंडों तथा तथाकथित मानवाधिकारवादियों, जिनकी आँखें केवल इन्हीं के लिये नम होती हैं, पर नकेल कसने की जरूरत है। इस नक्सल-आतंकी विषबेलि की एक अदृश्य जड़ नगरों में आसन जमाये है, वहाँ उसे खोज-खोजकर उबलते पानी से सींचने की जरूरत है।

Wednesday, July 9, 2014

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) स्थापना दिवस 9 ज्रुलाई पर विशेष....

राष्ट्र के ऊर्जापुञ्ज युवाशक्ति के संवर्द्धन, परिवर्द्धन एवं व्यक्तित्व-विकास को समर्पित विद्यार्थी आन्दोलन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् आज के ही दिन ९ जुलाई १९४९ को अपने ध्येय-पथ पर भारतीयकरण के अभियान के साथ आधिकारिक रूप से अग्रसर हुआ। अपने स्थापना काल १९२५ से ही देश की स्वतन्त्रता एवं राष्ट्र पुनर्निर्माण में तत्पर स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से इस युवा-विकास-पुञ्ज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का स्वतन्त्रता के अरुणिमा के बाद परिमल समीर के प्रवाह सा आगमन हुआ और तभी से युवाशक्ति के उत्थान एवं राष्ट्रोत्थान के विभिन्न दायित्वों का निर्वाह करते हुये यह समीर आजतक निरन्तर अहर्निश अपने गति, लय और तेज के साथ हर प्रकार के अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध बिगुल बजाते हुये तथा निर्माण एवं सृजन का नूतन व सुदृढ़ आधार प्रदान करते हुये प्रवाहित है। इस प्रवाह को समय-समय पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कुशल नेतृत्व द्वारा किये जाने वाले आन्दोलनों, विरोधों एवं अन्याय के विरुद्ध उठने वाले सशक्त स्वरों से प्राणऊर्जा मिलती रही है। चाहे वह पूर्वोत्तर में बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ हो अथवा कश्मीर में फैला उपद्रव या अलगाववाद या बलात्कार और अन्य सामाजिक कुरीतियाँ व अत्याचार, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का युवा सदा हर विषय में सजग रहा है और आवश्यकता पड़ने पर सड़क पर उतरने और अन्यायों से टक्कर लेने में भी तनिक न डिगा है। किसी भी प्रकार की सामाजिक, सामरिक, देश की आन्तरिक एवम् बाह्य समस्याओं से विद्यार्थी परिषद् ने न कभी मुँह मोड़ा है न पीठ दिखायी है। इसका इतिहास इस बात का साक्षी हि कि जिस किसी विषय को इसने उठाया है उसे उसके अन्तिम लक्ष्य तक ले गया है। वह विषय समाज के लिये परिणामकारी एवं कल्याणकारी रहा है। इन्दिरा सरकार ने जब देश पर आपातकाल की कालिमा पोती और पूरा देश एक बार कराह उठा तथा एक जन-अन्दोलन उमड़ा, अनेक नेता और समाजसेवी तथा सामान्य नागरिक आपातकाल के विरोध में जेल गये तब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का युवा चुप न बैठा। उसने भी इस अन्याय का घोर विरोध किया और बड़ी संख्या में इसके कार्यकर्ता जेल गये। अन्ततः आपातकाल का कलंकित काला बादल छँटा और पूरे देश की जनता में इसकी पुनरावृत्ति न हो ऐसी भावना जगा गया। शासनसत्ता को भी यह चेतावनी दे गया कि इस अमानवीय कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिये और न ही ऐसा कार्य इस देश की जनता सहन करेगी, वह इसके विरोध में सड़क पर उतरेगी।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने १९५२ में साक्षरता अभियान प्रारम्भ किया और राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मेलनों सहित विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया। यह संगठन १९६१ में गोआ मुक्तिसंघर्ष का सहभागी रहा। परिषद् ने १९६१ में चीन के आक्रमण का प्रतिरोध किया और १९६५ में पाकिस्तानी आक्रमण के विरुद्ध जनजागरूकता में सहभागी रहा। ग्रामीण भारत में शिक्षा एवं साक्षरता पर बल देते हुये परिषद् द्वारा ग्रामीण शिक्षा कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को सुनिश्चित करने के लिये १९६६ में  “Students’ Experience in interstate living’  प्रोजेक्ट प्रारम्भ किया गया, जिसके अन्तर्गत पूर्वोत्तर क्षेत्र के विद्यार्थियों का भारत के अन्य क्षेत्रों में प्रवास, निवास एवं भ्रमण एवं अन्य क्षेत्रों के विद्यार्थियों का पूर्वोत्तर में प्रवास, निवास एवं भ्रमण आयोजित किया जाने लगा। यह कार्यक्रम आजतक अनवरत् जारी है। विद्यार्थी परिषद् ने शिक्षा सुधार, समाज सुधार पर लगातार ध्यान दिया है, प्रदर्शन किये हैं, सरकारों को ज्ञापन दिया है और परिवर्तन को बाध्य किया है। भ्रष्टाचार जो इस देश में एक ज्वलन्त समस्या के रूप में व्याप्त है, उसके विरुद्ध विद्यार्थी परिषद् चार दशक से अधिक से निरन्तर संघर्षशील है तथा लगातार भ्रष्टाचारी दानव पर वार करती रही है। भारत की आत्मा और भारत की अधिकांश जनता गांवों में बसती है,। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये ग्राम विकास की आवश्यकता का अनुभव करके अभाविप ने १९७८ में ’ग्रामोत्थान हेतु युवा’ अभियान प्रारम्भ किया किया और ३५० गांवों में प्रभावशाली कार्य किया।
कश्मीर बचाओ अभियान के तहत श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा लहराने का प्रयास अभाविप ने किया और उसके आह्वान् पर इस कार्य हेतु देश की पूरी युवाशक्ति उमड़ पड़ी। देश-विदेश को इस बात का भान हो गया कि कश्मीर के अलगाववाद का स्वप्न देखना मात्र स्वप्न है यह कभी यथार्थ नहीं हो सकता क्योंकि भारत का युवा अभाविप के नेतृत्त्व में अंगद की तरह पैर जमाये हुये है, वह इस भूमि का एक अंगुल भी न देगा।
बांग्लादेशी घुसपैठ के विरोध में अभाविप ने ’चिकन नेक’ का घेराव किया और व्यापक राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन करते हुये सोती सत्ता को नींद से जगाया और इस समस्या के प्रति ध्यान अकर्षित करवाया। चाहे वे कश्मीर के अपने ही देश में विस्थापित पण्डित हों अथवा चीन द्वारा सताये तिब्बती बौद्ध परिषद् हर अन्याय के विरुद्ध चट्टान सी खड़ी रही है।

अभी हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा विद्यार्थियों पर अनावश्यक रूप से थोपे जा रहे चार वर्षीय स्नातक पाट्यक्रम के विरुद्ध अभाविप ने पूरे एक वर्ष के सतत् संघर्ष के बाद ऐतिहासिक सफलता पायी है। जिसके लिये दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभाविप के कर्मठ कार्यकर्ताओं सहित नवनिर्वाचित सरकार एवं नवनियुक्त मानव विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी धन्यवाद एवं भूरि-भूरि प्रशंसा की पात्र हैं। इन सभी के समेकित प्रयास से एक बार फिर छात्रहित-राष्ट्रहित का उद्घोष जीवन्त हो उठा।
जिन विषयों को देश का कुम्भकर्णी शासन कभी न देखता न देख सकता, ऐसे राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर अभाविप ने सदा शासन व समाज का ध्यान आकर्षित करवाया है।

अनेक अवसरों पर विभिन्न कुरीतियों, प्रथाओं, रूढ़ियों, कुसंस्कारों की जकड़ के विरुद्ध भी अभाविप का युवा खड़ा रहा है और जनता को जागरूक किया है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या समाज का, देश के भीतर की बात हो या बाहर की, सभी पर अभाविप से जुड़े सजग युवावर्ग का सदा ध्यान रहा है और आज भी है। समाज के प्रति अपने गुरुतर दायित्व का निर्वह्न करते हुये इस दूरदर्शी, समदर्शी, सर्वसमावेशी संगठन ने सदा व्यक्ति निर्माण से राष्ट्रनिर्माण के मन्त्र का पालन किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक युगप्रवर्तक ध्येयनिष्ठ डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का तेज, समरसता के संवाहक ऋषि माधव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरुजी) का ओज और संघ तथा परिषद् के अनेक कार्यकर्ताओं की ऊर्जा सम्मिलित होकर निरन्तर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की तरुण-तरंगिनी गंगा को प्रवाहमान किये है। देश का युवावर्ग इस संगठन की उस कूटस्थ नित्यता को बनाये रखेगा, जो इसे इस देश की वैदिक-औपनिषदिक ज्ञानराशि से मिली है और जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के युगप्रवर्तक ऋषियों की शेवधि है, इसके साथ ही युवावर्ग उस प्रवाह नित्यता युवाशक्ति के समावेश को भी सुनिश्चित करेगा, जिससे इस गंगा-प्रवाह की हर बूँद में नवीनता एवं गति आती है।  देश का युवा जिसके हाथ में इस संगथन की बागडोर है, अपनी सांगठनिक क्षमता का परिचय देते हुये समवेत् प्रयास द्वारा देश को ऊँचाइयों के नये शिखर पर ले जायेगा, आज के दिन यही आशा और विश्वास है। 

Sunday, June 22, 2014

हिन्दी-विमर्श: गृह मन्त्रालय द्वारा हिन्दी-प्रोत्साहन पर विशेष

गृह मन्त्रालय द्वारा हिन्दी को प्रोत्साहित किया जाना बहुत ही स्वागत योग्य कदम है। यदि इसका सही क्रियान्वयन होता है तो न केवल हिन्दी का आत्मविश्वास बढ़ेगा अपितु समस्त भारतीय भाषाओं की चमक वापस आयेगी। अंग्रेजी जैसी अ-बौद्धिक भाषा भारत की समस्त भाषाओं पर ग्रहण बनकर व्याप्त हो गयी है, जिससे न केवल इस देश की संस्कृति प्रभावित हो रही है अपितु साहित्य भी सिकुड़ रहा है। आज स्थिति यह हो गयी है कि बहुत से ऐसे पढ़े-लिखे लोग हैं जिनको अपनी भाषा में अपनी भावनाओं को ठीक से व्यक्त कर पाने में समस्या का अनुभव होता है। अंग्रेजी को अ-बौद्धिक भाषा कहना बहुत ही उपयुक्त है क्योंकि यदि इसके साहित्य की आधारशिला देखी जाये तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि किस तरह ग्रीक और लैटिन के खण्डहरों पर उगी हुयी काई है यह भाषा? ये अम्ग्रेज लोग बड़े ही गर्व से इलियड, ओडिसी, इनीद को अपने महाकाव्यों में सम्मिलित करते हैं। बहुत ही घमण्ड के साथ प्लेटो, अरस्तू को उद्धृत करते हैं। इसके साथ ही इनका इतिहास ग्रीक को कुचलने, लैटिन को फूँकने में संलग्न रहा है। दूसरी भाषा का अस्तित्त्व समाप्त कर उसके साहित्य सम्पदा पर आधिपत्य कर ये लोग राजा बने हुये हैं। यदि अंग्रेजी को देखा जाये तो जॉन मिल्टन के पैराडाइज लॉस्ट एक महाकाव्य मिलता है। पिछले शताब्दियों से अंग्रेजी की बौद्धिकता बढ़ाने का प्रयास निरन्तर चल रहा है, जिसके अन्तर्गत विश्व का समस्त समृद्ध साहित्य भण्डार अनूदित किया जा रहा है।
याहाँ प्रश्न अंग्रेजी के विरोध का भी नहीं है। किसी विरोध से सकारात्मकता नहीं प्रारम्भ होती। यहाँ अपनी भाषा का प्रसंग है। उस भाषा का जो स्वतन्त्रता आन्दोलन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी। जिसके माध्यम से क्रान्तिकारियों को दिशा दी गयी। जो परतन्त्र भारत के व्यथा की अभिव्यक्ति का माध्यम थी। जब हम हिन्दी भाषा की बात करते हैं तब उसके साथ-साथ हिन्दी की अनेक बोलियाँ जिसका क्षेत्र पंजाब से लेकर अरुणाचल तक विस्तृत है, सभी उसमें सम्मिलित होती हैं। इस प्रकार यह सीधे तौर पर एक व्यापक भूभाग की भाषा है। इसके साथ ही इस देश के सभी महानगरों एवम् बड़े नगरों में भी हिन्दी स्वतः स्वीकृत है। अतः यदि हिन्दी के संवर्द्धन की बात होती है तो यह किसी करुणानिधि अथवा जयललिता को बुरी नहीं लगनी चाहिये। यदि यह बात तमिलनाड़ु के नेताओं को खटकती है तो निश्चय ही यह उनके राजनैतिक द्वेष का परिणाम है।
संविधान सभा के विद्वान् सदस्यों ने १२-१४ सितम्बर १९४९ को गहन विचार-विमर्श और बहस के बाद हिन्दी को कामकाज की भाषा और अंग्रेजी को १५ वर्ष तक सहयोगी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसमें कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी, गोपालस्वामी आयंगर प्रभृत लोग सम्मिलित थे। नेहरू का भी मानना थी कि किसी देश की उन्नति अपनी ही भाषा से ही हो सकती है। देश को एकता के सूत्र में पिरोने के लिये हिन्दी आवश्यक थी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी(जिन्होंने प्रारम्भ में हिन्दी का विरोध किया था) ने भी हिन्दी को स्वीकार किया। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी हिन्दी के प्रबल समर्थक थे।
गृह मन्त्रालय द्वारा हिन्दी के प्रोत्साहन का स्वागत किया जाना चाहिये। यदि हिन्दी समृद्धि होगी तो तमिल, मलयालम, कन्नड़, बांग्ला, असमिया, गुजराती, मराठी, बोडो, संथाली, मणिपुरी, तेलुगु आदि सभी भाषायें समृद्ध होंगी। सभी के साहित्य-निधि का आदान-प्रदान होगा। 
बस हिन्दी का यह प्रोत्साहन कागजों और वक्तव्यों तक सीमित होकर न रह जाय, इसी बात का ध्यान रखना है। यदि यथार्थ में यह क्रियान्वित हो और बैठकों के विवरण् अतक के लिये अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पर निर्भरता कम हो, समाप्त हो, तो यह भाषा के जीवन के क्षेत्र में गृहमन्त्रालय का क्रान्तिकारी कदम होगा। इससे संस्कृति समृद्धि होगी, देश का आत्मविश्वास बढ़ेगा। उपनिवेशवादी मानसिकता से थोड़ा मुक्ति मिलेगी और भारत का युवा चेयर को कुर्सी और टेबल को मेज कहने में सकुचायेगा नहीं, लगायेगा नहीं।

Saturday, June 21, 2014

डॉ. हेडगेवार एवं भारतीय राष्ट्रवाद


आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक पूज्य डॉ. हेडगेवार जी की पुण्यतिथि के अवसर पर भारत नीति प्रतिष्ठान द्वारा "डॉ. हेडगेवार एवं भारतीय राष्ट्रवाद" विषय पर व्याख्यान का आयोजन हुआ। जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. कृष्णगोपाल जी, सरकार्यवाह (राष्टीय स्वयंसेवक संघ) का उद्बोधन सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रो. कपिल कपूर जी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की एवम् डॉ. अवनिजेश अवस्थी जी ने कार्यक्रम का विद्वत्तापूर्ण, सुव्यवस्थित एवं सफल सञ्चालन किया।
डॉ. कृष्णगोपाल जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि "भारत का प्रत्येक व्यक्ति स्वीकार करता है कि पूरा समाज एक है। यहाँ कोई भी प्रार्थना ऐसी नहीम् है जिसमें सबके कल्याण की बात न करके एक व्यक्ति के कल्याण की बात की गयी हो। इस देश का मौलिक सिद्धान्त है "सर्वे भवन्तु सुखिनः", "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" । इस सिद्धान्त के सर्वजनसमन्वय में एकात्मबोध है। केवल अपने लिये चिन्तन करने वाला अभारतीय है। पूर्वोत्तर की २२२ जनजातियों में किसी ने कभी भी एक -दूसरे पर अतिक्रमण नहीं किया, न ही दूसरे की पूजा-पद्धति और मान्यताओं को अमान्य बताया। यह है भारत के मौलिक सिद्धान्त में निहित सहिष्णुता की भावना। यह है भारत का मौलिक प्रवाह। जो परम्परा के प्रवाह में हजारों वर्ष से प्रवाहित है, वह है राष्ट्रदर्शन। जो पचाने का एवं सहिष्णुता का साहस रखना है वह दर्शन हिन्दु-राष्ट्र का है।  जो भी राष्ट्र-तत्त्व की गहराई में जायेगा उसे इसी मौलिकता का दर्शन होगा। इसी सनातल सत्य को समझकर निष्ठा के साथ प्रवाहित होने वाली धारा है संघ।"
इस अवसर पभारत नीति प्रतिष्ठान के निदेशक एवं संघ-विचारक प्रो. राकेश सिन्हा जी ने "डॉ. हेडगेवार एवं उपनिवेशविरोधी आन्दोलन" विषय पर प्रकाश डालते हुये राष्त्राय स्वयंसेवक संघ की विभिन्न स्वतन्त्रता आन्दोलनों में भूमिका पर तथ्यपूर्ण प्रकाश डाला तथा उन्होंने बताया कि किस प्रकार संघ की स्वतन्त्रता आन्दोलन में भूमिका को इस देश के मार्क्सवादी, नेहरूवादी इतिहासकारों द्वारा नियोजित तरीके से नजरअन्दाज किया गया है और किस प्रकार राष्ट्रीय अभिलेखागार में संघ से सम्बन्धित दस्तावेजों को नष्त करने की दुर्नीति अपनायी गयी है। तथ्यों से खिलवाड़ और तथ्य छुपाने का एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करते हुये उन्होंने संविधान सभा में २ माह तक धर्मनिरपेक्षता पर चली बहस (जिसका इतिहासकार कहीं उल्लेख तक नहीं करते) एवं नेताजी बोस द्वारा शम्कर राव देव को RSS पर लिखे पत्र एवं शम्कर राव देव द्वारा उसके उत्तर का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संघ की भूमिका को लेकर मार्क्सवादी, नेहरूवादी इतिहासकारों ने न केवल चुप्पी साधी है बल्कि उसके दस्तावेजों को नष्ट करने का भी काम किया है।
प्रो. कपिल कपूर जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि डॉ. हेडगेवार अपने समय के विभिन्न क्रान्तिकारी एवं राष्ट्रवादी व्यक्तियों से इसी रूप में भिन्न हैउं कि उन्होंने गुरु गोरखनाथ और गुरु अर्जुनसिंह जैसे एक संगठन खड़ा किया और उस संगठन के माध्यम से आत्मजागरण को प्रोत्साहित कर समाज को एक ऊर्जा एवं विश्वास से भरा, सोये सांस्कृतिक मूल्यों को पुनर्जागृत करने एवं पुनर्प्रतिष्ठित करने का बीड़ा उठाया।
#RSS #IPF  #nationalism ॑#राष्ट्रवाद,

इस अवसर पर डॉ. राहुल सिंह, श्री गोपाल अग्रवाल, डॉ. शरदिन्दु मुखर्जी सहित बडी संख्या में प्रबुद्ध जन एवं छात्र-छात्राओं तथा शोधार्थियों की उपस्थिति रही।

Friday, June 13, 2014

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, हिन्दी के एक आधार स्तम्भ के रूप में प्रसिद्ध हैं। ये सेठ 
अमीचन्द के वंशज थे, जिन्होंने सिराजुद्दौला और क्लाइव के मध्य समझौता 
करवाया था। अपने धन के विषय में इनका कहना था कि " जिस धन ने हमारे पुरखों 
को नष्ट किया उसको हम नष्ट करेंगे।" ये व्यक्ति नहीं वर्न् संस्था थे। 
इअन्के सान्निध्य में हिन्दी के अनेक मूर्धन्य विद्वानों का जन्म हुआ।
आज भारतेन्दु जी के जीवन का एक बहुत ही मार्मिक प्रसंग अचानक याद आ गया। 
रामनगर (वाराणसी) के राजा इनके समवय थे और इनके परम् मित्र हुआ करते थे। 
किसी कारणवश भारतेन्दु जी और राजा रामनगर में मनमुटाव हो गया था। भारतेन्दु
 जी अस्वस्थ थे और शैय्या पर लेटे हुये थे। ऐसी अवस्था में उन्होंने सुन्दर
 अन्योक्ति का सहारा लेकर गोपिकाओं के विरह-वर्णन द्वारा अपने मित्र को 
अपने मन की व्यथा बतायी। राजा रामनगर को उन्होंने पत्र में लिखा-

आजु लौं जौ न मिले तौ कहा हम तो तुमरे सब भाँति कहावैं।
मेरौ उराहनौ है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावैं।
जो हरिचन्द भई सो भई अब प्राण चले चँहैं तासो सुनावैं।
प्यारो जु है जग की यह रीति विदा के समय सब कण्ठ लगावैं॥

कितनी गहन भावाभियंजना है। गोपिकाये कृष्ण से कहती हैं कि अब प्राण-पखेरु 
उड़ने वाले हैं, अब तो आकर अन्तिम समय भेंट कर लो। वैसे भी हम तो सभी प्रकार
 से तुम्हारे ही हैं । हमें कोई उलाहना नहीं देना है, सभी को उसके भाग का 
फल मिलता है।
राजा रामनगर को यह पत्र भारतेन्दु जी ने तब लिखा जब वे गम्भीर रूप से 
अस्वस्थ थे और अन्तिम दिन निकट था। कितना मार्मिक प्रसंग है। जब यह पत्र 
राजा को मिला तो वे भारतेन्दु जी से मिलने आये। उनकी दवा भी करवायी । 
परन्तु राजयक्ष्मा से पीड़ित होंने की कारण भारतेन्दु जी ने इस संसार से 
विदा ले ली।
यह पत्र भारतेन्दु जी के हृदय का एक करुण-दर्पण है। जो सभी के हृदय में 
समान संवेदना जागृत उत्पन्न करता है।

Thursday, May 22, 2014

भाजपा का सराहनीय कदम...

भाजपा ने श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेस के सभी देशों को न्यौता दिया जाना निश्चय ही स्वागतयोग्य कदम है। इसकी सराहना होनी चाहिये। सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से हमारे चिर सहचर और सहगामी इन देशों को विशेष स्थान देना आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य था। हजार झंझावातों, कटुता और मनमुटाव के बीच भी हम इस अकाट्य सत्य को नहीं विस्मृत कर सकते की हममें आधारभूत रूप से एक ही संस्कृति का प्रवाह अनुस्यूत है। इन सभी दक्षेस देशों के जन-मन में भावों का जो उद्गार है वह एक धरातल पर जाकर कहीं न कहीं एक होता है ठीक उसी तरह जैसे डेल्टा की सभी धारयें समुद्र में एक हो जाती है।
भाजपा के इस समन्वयकारी और सौहार्द्रपूर्ण कदम की कुछ लोग पानी पी-पीकर निन्दा कर रहे हैं । आश्चर्य की पराकाष्ठा तब होती है जब हम देखते हैं कि इस मुहिम में वे लोग बहुत आगे हैं जो कल तक इन सभी देशों के बहुत बड़े पक्षधर हुआ करते थे, जो बांग्लादेशी घुसपैठ पर मौन, पाकिस्तानी हिन्दुओं पर मौन, कश्मीरी पण्डितों पर मौन, तिब्बत पर मुँह सिले बैठे थे। आज यही लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं । लोटे तो बहुत देखे थे बेपेंदी के पर ऐसे बेपेंदी के बुद्धिजीवी अब सहजता से दिखने लगे हैं। मुझे तो कई बार लगता है कि कही यदि भाजपा मार्क्स और माओ की गलती से प्रशंसा कर दे हालांकि वह ऐसा करेगी नहीं तो ये लोग मार्क्स और माओ को भी पानी पी-पी कर गली देने लगेंगे । ऐसे अनेकमुँहों को अब हालांकि जनता पहचानने लगी है परन्तु अब भी इनका पूरा रंग धुलना शेष है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अपने पड़ोसी देशों से अच्छा सम्बन्ध रखना, एक सौहार्द्रपूर्ण व्यवस्था बनाना अपरिहार्य है। सम्पर्क सजगता और सहजता दोनों लाता है। सहजता से बहुत सी दुर्गटनायें और दुर्योग टल सकता है। सहजता स्थापित होंने से गलतफहमियाँ भी नहीं पनपती और सम्बन्ध मजबूत होता है। निश्चय ही यह भाजपा का बहुत ही उदार और दूरदर्शी कदम है जो भारतीय संस्कृति की छवि को धवल जल पर प्रतिबिम्ब सा प्रदर्शित करता है।

Wednesday, May 21, 2014

राष्ट्र-ध्वन्स के स्वप्नदृष्टा...

कुछ लोग ऐसे भी हैं हमारे देश में जिनको राष्ट्र-ध्वंस में अपार आनन्द आता है। जो इस देश को तार-तार करने के सपने से आननदरसपान कर भावविभोर और आत्ममुग्ध हुआ करते हैं। कोई भी ऐसी बात जो सामज् को जोड़े वाली हो, समाज में विखण्डन एवम् विभ‘झ्जन के विरुद्ध हो उसको देखते ही इनको बदहजमी हो जाती है। आजकल इनकी इस अपच को विश्व-संचार कराने के लिये एक साधन भी मिल गया है यह फेसबुक । ऐसे लोग जिनको प्रायः Intellectual बुद्धिजीवा अथवा बुद्धिमान् कहा जाता है, आज कल विशेष आहत दृष्टिगत होते हैं । वे इतने आहत हैं कि उन्होंने फेसबुक को चिकित्सालय समझ लिया है। मकड़ी जितनी निपुणता से आत्मरक्षा के लिये अपना जाल बनाती है, ये उससे भी अधिक निपुणता से अपनी और अपनी विचारधारा के रक्षार्थ शाब्दिक जाल बनाते हैं, उसे भारी-भरकम शब्दों से सजाते हैं। मकड़ी तो जाल बनाने में अपना कुछ श्रम और व्यय भी करती है, ये भी कुछ ऐसा करते हैं इस बात पर संदेह है। ऐसे कई ’सज्जन’ और ’जनहितैषी’ फेसबुक पर ऐसे गरल उगल रहे हैं, जिसा कि समुद्रमन्थन में भी न निकला होगा । अब इनका गरल पीने के लिये किसी को नीलकण्ठ बनना आवश्यक हो गया है। वैसे भी इस जमात से सावधान रहने की आवश्यकता है सर्वदा क्योंकि ऐसे बुद्धिमान् लोग वह विष होते हैं जो समूचे देश को मृतप्राय बना देते हैं। सम्भवतः इसी लिये चाण्क्यसूत्र कहता है कि "धनुर्धारी का मारा हुआ एक तीर अपने लक्ष्य को मार सके या न मार सके परन्तु बुद्धिमानों की प्रयुक्त बुद्धि नायक सहित राष्ट्र का ध्वन्स कर डालती है।-
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता।
बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्ति राष्ट्रं सनायकम्॥
ऐसी आस्तीन के ब्यालों से बचना आज अपरिहार्य है। भगवान् इन्हें सद्बुद्धि दे।

जनादेश एवं अपेक्षायें...

मँहगाई से व्यथित, विभिन्न क्षेत्रों में आतंक से लेकर क्षेत्रीय गुण्डाराज, अवैध वसूली, कचहरी और थानों के व्यर्थ चक्कर से पीड़ित, विभिन्न व्यथाओं से व्यथित जनता ने अबकी बार समवेत स्वर से व्यापक जनादेश दिया है। इस जनादेश के साथ ही यह आशा और विश्वास भी जताया है कि विकास होगा, जिसका लाभ जन-जन को मिलेगा। श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी अपने प्रथम चरण से इसी बात का संकेत दिया है कि उनकी प्राथमिकता देश का विकास और व्यवस्था का पुनर्स्थापन है। जब व्यथा बड़ी होती है, तब आवश्यकता भी बड़ी हो जाती है और अपेक्षायें भी बड़ी होती हं । जितनी बड़ी अपेक्षायें होती हैं, उतनी ही बड़ी बाधायें भी आती हैं उनकी पूर्णता के मार्ग में । यही सदिच्छा है कि विभिन्न अटकलों, अवरोधों एवं बाधाओं को पार करते हुये श्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारतीय जनता की अपेक्षायें एवम् इच्छायेम् पूर्ण हो सकें । देश निराशा के वातावरण से आशा के प्रकाशमय जगत् तक की यात्रा कर सके। बहुत दिनों तक कालिमा थी, अन्धकार छाया हुआ था, मार्ग नहीं सूझता था। पिछली यूपीए सरकार में तो ऐसी कालिमा थी जैसे चन्द्रमा की चन्द्रिका को भी राहु ने ग्रस लिया हो। आज जनता के सार्थक समर्थन एवम् विश्वास से वह अन्धकार दूर हुआ है। नया विहान हुआ है। नव सूत्रपात हुआ है। कहते हैं कि बीज जितना सशक्त एवं उर्वर होता है पौढा और व्रुक्ष भी उतना ही शक्तिशाली एवं सुदृढ़ होता है। यह सरकार सुदृढ़, दृढ़निश्चयी और परिवर्तन कारी बने यही अपेक्षा है। मात्र सत्तापरिवर्तन ही नहीं अपेक्षित है शिक्षा से लेकर समाज तक प्रत्येक स्थान पर व्यवस्था-परिवर्तन भी अपरिहार्य है। देश को जकड़ती जा रही हीनभावना की सुरसा के मुख सदा-सदा के लिये बन्द हो जायँ और यह युवा देश एक बार फिर विश्व पटल पर गरजे, हुंकारे और अपनी युवा-प्रतिभा का दिग्दर्शन कराये। 
सपना सच हुआ...
पर नेत्र अभी उनींदे हैं...
नवल आलोक के सजे कसीदे हैं...
वो साकार सृष्टि करें यही उम्मीदे हैं।

युवा युग विजेता है...

कल संसदीय दल की बैठक में एवं बैठक से पूर्व जो दृश्य जनमानस के समक्ष उपस्थित हुआ वह निश्चय ही अभिभूत कर देने वाला था। लोकतन्त्र के एक नये युग का सूत्रपात हो चुका है, जिसमें एक नवल स्फूर्ति है, नयी ऊर्जा है और नवोत्थान की अभूतपूर्व प्रेरणा है। जिसकी आत्मा ही दैदीप्यमान शक्तिपुञ्ज से वेष्टित है। लोकतन्त्र मन्दिर है ऐसा पुस्तकों के अलंकृत शब्दों में दिखायी पड़ता था या कतिपय जिह्वाओं पर भूषित होता था परन्तु श्री नरेन्द्र मोदी ने लोकतन्त्र मन्दिर है इस बात को मनसा-वाचा-कर्मणा सिद्ध कर दिया। ड्योढ़ी पर प्रणाम और श्रद्धाज्ञापन हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा है, उस परम्परा का निर्वहन करते हुये न केवल मोदी जी ने अपनी हार्दिक भक्ति दिखायी है अपितु इस देश के जनमानस को परम्पराओं के प्रति श्रद्धा और विश्वास का भी संदेश दिया है।
संशदीय दल की बैठक में श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उच्चरित शब्द-शब्द अत्यन्त विश्वासपूर्ण था। उत्साह, उमंग और उल्लास का जो समावेश उस अद्भुत वाणी में था, उससे जो ऊर्जा निकलती है, वह है आशा की ऊर्जा, विश्वास की ऊर्जा, एक तेजपुञ्ज के स्रुजन और संस्कार की ऊर्जा। यह ऊर्जा न केवल भाजपा एवं उसके कार्यकर्ताओं को अनुप्राणीत करती है अपितु देश के कण-कण को भी प्रमुदित व विह्ँसित करती है। यही ऊर्जा वह गति है जो वस्तुतः इस युवा देश को चाहिये। यही ऊर्जा वह द्युति है जिसकी चपलता, चंचलता एवं शक्ति की हमें अपेक्षा है। देश की जनता ने लोकतन्त्र की पुनर्टीका की है और लोकतान्त्रिक परम्परा के प्रवाह हो आगे बढ़ाया है। आज देश ऊर्जस्वित है। निश्चय ही तेजस्वी भारत का निर्माण होगा, इस बात के प्रति आशान्वित है।
इस चुनाव ने यह भी सिद्ध कर दिया की वास्तव में युवाओं में वह क्षमता है कि वह नव-युग का सूत्रपात कर सकें, एक नया इतिहास रच सकें ।
य़ुवा इतिहास सृजेता है।
युवा युग विजेता है॥

Saturday, April 19, 2014

हमारे देश में तिरस्कृत दो आधारभूत तत्त्व-गृहिणी एवं कृषक

हमारे देश में दो आधारभूत तत्त्वों को गम्भीर रूप से उपेक्षित रखा गया है। प्रथम गृहिणी (House Wife) और द्वितीय
कृषि एवं किसान (Agriculture and farmer)। ये दोनों ही तत्त्व परिवार, समाज एवं राष्ट्र की आधारशिला हैं। आज दोनों की स्थिति विडम्बनीय है। स्वतन्त्रता के पश्चात् इन दोनों के विकास एवं प्रतिष्ठा के प्रति सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिये था, परन्तु आज तक दोनों क्षेत्र अत्यन्त उपेक्षित हैं। जिस प्रकार वर्तमान समाज में ’गृहिणी’ (House Wife) शब्द अपनी गरिमा खो चुका है और कहीं न कहीं हीनता का द्योतक माना जाने लगा है उसी प्रकार हमारे देश में ’किसान’ शब्द भी अपनी गरिमा से स्खलित होकर हीनताबोधक बन गया है। ऐसा नहीं है कि इन शब्दों ने अथवा इनसे द्योतित अर्थों ने स्वयं इस स्थिति का चयन किया है। इन्होंने इसका चयन कदापि नहीं किया है। हमारे देश का तथाकथित विकास और तथाकथित ’सभ्यता’ की परिभाषा इनकी इस दुर्गति का कारण है। जहाँ मिट्टी से जुड़ी हर बात गौण एवं निम्नस्तरीय समझी जाती है, भले ही पेट की आग बिना मिट्टी की सोधीं सुगन्ध के न बुझती हो। आज इन दोनों शब्दों, दोनों सम्बोधनों के हीन एवं तिरस्कृत स्थिति का परिणाम परिवार, समाज एवं देश भोग रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आज स्वतन्त्रता के छः दशक व्यतीत हो जाने पर भी हमारे देश के नीति-नियन्ताओं एवं वर्तमान तथा भावी कर्णधारों को इन आधाअरभूत तत्वों पर दृष्टिपात करने एवम् इनकी गरिमामय उपस्थिति व स्थिति सुनिश्चित करवाने की तनिक भी चिन्ता नहीं है। ऐसे में देश को तो रसातल में जाना ही है। जब भी कोई देश अपने आधार की अनदेखी करता है तब उसे उसका भारी मूल्य चुकाना पड़ता है। भारत का इतिहास ऐसे उद्धरणों से भरा पड़ा है कि जब-जब अति आवश्यक तत्त्वों एवम् विशेषताओं की स्थिति दुर्बल हुयी है, देश दुर्बल हुआ है, पराजित हुआ है, परास्त हुआ, परतन्त्र हुआ है। फिर पीढ़ियों ने एक संघर्षगाथा लिखकर स्थिति-परिवर्तन किया है। मात्र शब्दों की अट्टालिका खड़ा करने एवं वार्ताओं  की झड़ी लगाने से देश न चलता है और न ही चल सकता है। ऐसा करके देश को स्थिर एवं स्थापित करने का सपना देखने वालों का सपना ताश के पत्तों एवं बालुकाभित्ति सा एक क्षीण वायु के हिलोर से ढह जायेगा।

आज स्थिति यह है कि बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे जो अपनी माँ को ’गृहिणी’ (House Wife) बताना पसन्द करते हैं। जब किसी युवा से यह प्रश्न किया जाता है कि आपकी माँ क्या करती हैं? तो अनेक प्रकार के उत्तर अनेक प्रकार की ऊर्जा के साथ आते हैं। यदि किसी की माँ डॉक्टर, इन्जीनियर, प्रोफेसर, शिक्षिका अथवा कोई अधिकारी है, तो तपाक से बहुत जोश के साथ उत्तर मिलता है कि मेरी माँ अमुक अधिकारी हैं आदि आदि। परन्तु यदि किसी की माँ इन सबसे इतर गृहिणी है और अपना पूरा समय घर-परिवार की संस्कारशाला से लेकर पाकशाला तक के सुसज्जन एवम् सुव्यवस्थापन में व्यतीत करती है, तो उत्तर आता है कि ’मेरी माँ कुछ नहीं करती, ‘House wife’ हैं, बहुत ही दबे स्वर में। ऐसा सुनकर सामने वाला भी धीरे से हुँकारी भरता है। अब सोचिये भला कितनी दयनीय एवं शोचनीय स्थिति है? इस स्थिति की समीक्षा होना अति आवश्यक है। ऐसी ही सम्मनरहित स्थिति के कारण आज कोई भी लड़की गृहिणी बनकर जीवन-निर्वाह नहीं करना चाहती। और चाहे भी क्यो जब उस स्थिति में अपेक्षित सम्मान एवं प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त होती। यही कारण है कि आज स्त्रियों को स्वयं स्थापित होंने के लिये घर से बाहर इच्छा-अनिच्छापूर्वक काम करना पड़ता है और साथ ही साथ घर भी सम्हालना पड़ता है। इस प्रकार उसे दोगुने से अधिक भार वहन करना पड़ता है। प्रश्न यह है कि क्या ’काम करने’ की परिभाषा घर के बाहर ही जो कुछ किया जाता है या जा सकता है वहीं तक सीमित है? क्या घर में किया जाने वाला कार्य काम की श्रेणी में नहीं आता? क्या जिस कार्य के घण्टे तय हैं एवम् जिसके लिये एक कार्यालय भवन बना हुआ है, वही कार्य कहा जा सकता है, और उसी कार्य को करनेवाला कामकाजी कहा जा सकता है? घर में काम करना, पूरे दिन घर सँवारना, गेहूँ पिसाने से लेकर आँतों की पाचन-प्रक्रिया तक की चिन्ता करना, यह काम नहीं है? यदि यह काम नहीं है तो यह प्रक्रिया किस श्रेणी में आती है? इस कार्य का कोई मूल्य नहीं आँका जाता और जब चाहे जिसका मन हो कहता फिरता है कि “तुम तो दिनभर घर पर ही रहती हो, तुम्हारा क्या काम है, क्या करती हो?” यह कहते समय सम्भवतः लोगों को उस स्थिति की कल्पना ही नहीं होती कि एक व्यवस्था स्थापित करने में कितना श्रम और समर्पण लगता है। आज सम्भवतः जो लोग महानगरीय जीवन जी रहे हैं, और पति-पत्नी दोनों बाहर काम करते हैं, कुछ सीमा तक इस बात को समझ सकते हैं कि घर सम्हालना एवम् उचित भोजन-व्यवस्था बनाये रखना वास्तव में कितना चुनौतीपूर्ण कार्य है? शब्दों का मर्म समझना बहुत आवश्यक है। और शब्द प्रयोग करते समय उसके अर्थ की सीमाओं एवम् विस्तार पर भी ध्यान देना अपरिहार्य है। मुझे लगता है कि ’कामकाजी’ शब्द को अब पुनर्परिभाषित करने का समय आ गया है। एक गृहिणी द्वारा किया गया व्यवस्थापन संसार का सर्वश्रेष्ठ व्यवस्थापन है विना किसी एमबीए स्कूल में गये। अतः एक गृहिणी की शक्ति, कुशलता एवं उसके समर्पण को समाज एवं शासन दोनों उपेक्षित करना बन्द करें एवं उसकी प्रतिष्ठा वापस लाने हेतु आवश्यक पहल करें अन्यथा इसका दीर्घकालीन परिणाम भुगतने के लिये तैयार हो जायें।
गृहिणी की भाँति कृषि और कृषक भी इस देश में उपेक्षित जीवन जी रहा है। उसके लिये अपेक्षित सम्मान का नितान्त अभाव है। यही कारण है कि आज देश में कोई स्वयं को किसान नहीं कहना चाहता। खेती पार्टटाइम व्यवसाय का विषय बन गयी है। जब जेठ महीने में बहाये गये श्रमसीकर का कोई मूल्य नहीं है तो भला कोई क्यों पसीना बहाये? आज किसान आत्महत्या करने को विवश हैं। इसी से पता चलता है कि स्थिति कितनी दयनीय है? संसार में भोग एवम् ऐश्वर्य कि चाहे कितनी भी वस्तुये हो जायँ पर जठराग्नि अन्न से ही बुझेगी। इसीलिये शास्त्रों में अन्न को ’अन्न देवोभव’ कहा गया है। इतना सम्माननीय स्थान इसे यो ही नहीं प्रदान किया गया है अपितु इसके अकाट्य विशेषता के कारण इसे ऐसा स्थान मिला है। आज उसी अन्नदेव का उत्पादन करने वाला कृष्क घोर उपेक्षा का शिकार है। कोई उससे बात तक नहीं पूछने वाला। ऋण के बोझ के तले दबा वह कराह रहा है। कोई आह तक सुनने वाला नहीं है। जब भी कभी उसकी पीड़ा और चीत्कार सामने आती है तो राजनेताओं द्वारा उस पर गार ही उड़ेला जाता है दर्द हरने के नाम पर। खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं। खेती हतोत्साहित होने से पशुपालन स्वतः हतोत्साहित होता है। हमारे देश में किसान उपेक्षित, कृषि हतोत्साहित है तो पशुपालन भी खतरे में है। कुपोषण पर बहुत चर्चायेम् होती हैं, गोष्ठियाँ होती है तथा महान् चिन्ता व्यक्त की जाती है। परन्तु दुःख और आश्चर्य इस बात का है कि ग्राफ दिखा-दिखाकर विलाप करने वाले लोग उसके वास्तविक समाधान की ओर देखना तक नहीं चाहते।
जिस प्रकार यह एक अकाट्य सार्वभौमिक, सार्वकालिक सत्य है कि कृषि ही मानवता का आधार है, उसी प्रकार यह भी एक चिरसत्य है कि कृषि सबसे जोखिम भरा व्यवसाय है। पञ्चतन्त्र में विष्णुशर्मा ने राजकुमारों को शिक्षित करने के प्रसंग में सर्वप्रथम इसी बात की शिक्षा दी थी कि कौन सा व्यवसाय किस प्रकृति तथा किस प्रकार के लाभ-हानि वाला है। वहाँ उन्होंने कृषि को सर्वाधिक जोखिमपूर्ण बताया है। आज भी यह बात उसी प्रकार सत्य है। भारतीय कृषि जिसके विषय में कहा जाता है कि यह मानसून का जुआ है, उस पर तो यह जोखिम का सिद्धान्त सर्वाधिक लागू होता है। ऐसे में हमारे किसानों को सब्सिडी क्यों नहीं चाहिये? शासन इस बात की चिन्ता क्यों नहीं करता कि हमारे किसान सुखी-समृद्ध कैसे हों? कुपोषण समाप्त करने के लिये दूध एक प्रमुख आहार है । यदि पशुपालन सम्यक् नहीं होगा तो दूध क्या आकाश से बरसेगा या धरती फूटकर निकलेगा। पशुपालन को सुदृढ़ करना ही दूध की कमी पूरा करने का एकमात्र समाधान है। यदि कृषि और पशपालन पर हमारे देश में ध्यान नहीं दिया गया तो हम इन दोनों क्षेत्रों में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भिखमंगे के समाज अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोप के आगे अपना आँचल फैलाये रहेंगे अथवा इसका कुछ सिंथेटिक समाधान ढूँढना पड़ेगा, जो असम्भव है। आज तक विज्ञान किसी भी मूलतत्त्व की सृष्टि नहीं कर पाया है। अमेरिका और यूरोप की हार्दिक इच्छा यही है कि भारत की परम्परागत कृषि और पशुपालन पद्धतियाँ इतनी हतोत्साहित हो जायें कि कोई भी इस क्षेत्र में जाना ही न चाहे और इस प्रकार बढ़ी हुयी माँग घरेलू उत्पादन से पूरी न हो पाने पर भारत इन वस्तुओं एवम् उत्पादों को उनसे आयात करे। इस प्रकार भारत उनके लिये एक बड़ा बाजार सिद्ध हो।

किसान को उचित सहायता देकर, उसके श्रम को उचित सम्मान देकर, उसकी गरिमा की पुनर्प्रतिष्ठा आवश्यक है। समाज एवं देश के संतुलित विकास के लिये गृहिणी के योगदान को रेखांकित करते हुये उसका सम्मान सुनिश्चित करना ही होगा । किसानों एवं पशुपालकों के श्रम एवं समाज के प्रति इनके योगदान को बताते हुये, इन्हें सशक्त बनाना आज के समय की अपरिहार्य आवश्यकता है। ये दोनों किसी भी समाज की जड़ हैं, आधारभूत तत्त्व हैं। कोई भवन अथवा समाज दोनों आधार से ही शक्तिशाली और  दुर्बल होता है। अतः इन आधारभूत तत्वों पर गम्भीरता से ध्यान दिया जाना चाहिये ताकि देश का समावेशी एवं समेकित विकास हो सके और वास्तव में एक विकसित देश का हमारा सपना पूरा हो सके विना अपनी मौलिकता को विनष्ट किये। घर एवं जीवन  सँवरता है गृहिणी से और समाज तथा देश सँवरता है किसान से।

Tuesday, April 15, 2014

मोदी जी ने ठीक ही तो कहा राहुल को बच्चा

मोदी जी द्वारा राहुल माइनो के लिये ’बच्चा’ सम्बोधन सटीक एवं उपयुक्त है। इससे मोदी जी का शब्दसामर्थ्य पता चलता है। ’बाल’ /’वत्स’ जिसका अपभ्रंश रूप ’बच्चा’ है, उनके लिये भी प्रयुक्त होता है, जो किसी विषय, विधा अथवा शास्त्र में अनभिज्ञ हों अथवा उसके विषय में जानकारी प्राप्त करने की शुरुआत कर रहे हों। जैसे यदि कोई व्यक्ति ’जर्मन’ भाषा सीखना प्रारम्भ करता है तो वह ’जर्मन’ भाषा के लिये ’बच्चा’ ही होगा। यद्यपि राहुल ’आयुवृद्ध’ हैं परन्तु यह बात भी सत्य है कि वे ’ज्ञान-बाल’ हैं। ’अनुभव-बाल’ भी उनको कहा जा सकता है। राजनीति में मुख्यतः तीन प्रकार के पौधे होते हैं- (१)जंगल में स्वयं के लिये संघर्ष करके उगे देवदार, (२) गमले में किसी के द्वारा रोपे एवं संरक्षित किये गया सजावटी गेंदा (गेंदा इसलिये कि इसमें अपना कुछ एण्टीबैक्टीरियल गुण तो होता है। यद्यपि दूसरों के हाथों रोपे जाते हैं) (३) ग्रीन हाउस में गम्भीर संरक्षण (ICU) में पले-बढ़े पौधे, जिनको वह धूप भी कुम्हला देती है, जिसके लिये ’देवदार’ संघर्ष करते हैं। राहुल गाँधी तीसरी कोटि के पौधे हैं। हम सभी जानते हैं कि ग्रीन हाउस की उपज कितनी क्षणिक एवं कितनी बालसुलभ, कितनी कोमल होती है। आत्मविकास की तो वहाँ तनिक बात तक नहीं होती। क्या हार्मोन कैसे डाला जायेगा ये वैज्ञानिक और किसान तय करते हैं । फसल कैसी होगी, पौधा कैसे बढ़ेगा, कब कितना उत्पादन करेगा यह भी पूर्वानुमानित और तय होता है। सभी सुख-सुविधायें व एशोआराम के बीच पले ग्रीनहाउस के पौधे हमेशा ’बाल’ बने रहते हैं, यही इनकी खासियत है । जिसके कारण बाजार के वर्ग-विशेष में इनकी माँग बनी रहती है। खैर...ठीक ही तो कहा महोदय अभी ’बच्चे’ हैं, फिर इतनी तिलमिलाहत क्यों? यदि इतनी तिलमिलाहट ही है, तो आखिर ’युवा’ कहने पर तमतमाहट क्यों नहीं? जबकि युवा की राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय तय आयुसीमा के अन्तर्गत भी राहुल नहीं आते। तो फिर राहुल को ’वृद्ध’ क्यों न कहा जाय? यदि सब पर उनके और उनके अनुयायियों को आपत्ति है, तो क्या नयी श्रेणी गढ़ी जाय, जिसमें नेहरू-खान-माइनो-"गांधी" परिवार का एकाधिकार हो, जिसे दिल्ली के श्मशानों पर।

Friday, April 11, 2014

मुलायम के कलुषित हृदय को उजागर करने वाली धन्य है तू जिह्वा...

कहते हैं कि दिल की बात जुबान पर आ ही जाती है। आखिर मुलायम सिंह दिल की बात निकालने को उतावली अपनी मचलती रसना (जीभ) को भला कब तक रोक पाते? अपनी जीभ से तलवार चलाने में माहिर समाजवादी पार्टी के "समाजवादी" नेता जी के मुँह से उनकी असलियत तो निकलनी ही थी, सो निकल गयी। समाजवादी पार्टी विषवमन और समाज में विषवपन के लिये प्रसिद्ध है ही। आखिर विष के बीज बो-बो कर उसकी पार्टी सत्ता में जो आती है। अब भला अपना चरित्र कैसे छोड़ दे? जो लोग आजम खाँ की विषाक्त जिह्वा से आश्चर्यचकित थे, उन्हें अब पता चल गया होगा कि उसकी कैंची जैसी जीभ को बल कहाँ से मिलता है। आज ’जैसा राजा वैसी प्रजा’ कहावत भले न सही हो पर ’जैसा मुखिया वैसे घरवाले’ ये कहावत चरितार्थ हो गयी। मुलायम ने समाज में वैमनस्य फैलाने वाली बेलगाम जुबानों पर कभी लगाम लगाने की कोशिश नहीं की, क्योंकि ये तो उन्हीं के द्वारा इसी विषवमन के लिये रोपे गये पौधे थे। आज उन्हीं मुलायम की स्त्रियों के प्रति घटिया एवं अपराधियों के प्रति उदात्त भावना देखकर मुझे कदापि आश्चर्य नहीं हो रहा है। उत्तरप्रदेश के हर नागरिक को, जो मुलायम का क्रीतदास नहीं है, उसे यह बात स्पष्टरूप से पता है कि अपराधियों को पाल-पाल कर ही सपा सत्ता में पहुँचती रही है और इस बार भी पहुँची है। वह अपराध चाहे हत्या, डकैती, लूट, अपहरण जैसी गुण्डागर्दी हो या बलात्कार जैसे जघन्य कृत्य...सभी अपराधियों के लिये मुलायम की मुलायम तकिया अच्छी पनाहगाह एवं स्वप्नगाह है। ऐसे व्यक्ति या ऐसे ’समाजवाद’ के ढोंगियों को अपना अमूल्य मत देते समय एक बार तो अवश्य सोचना चाहिये। इसबार के चुनाव में सकारात्मक बात यह है कि अब हमारे देश की जनता ने सोचना-विचारना शुरू कर दिया है। जिन महिलाओं के प्रति मुलायम ने इतना घृणित बयान दिया है, उस महिलावर्ग ने भी अपने अधिकारों को पहचानना प्रारम्भ कर दिया है और दिल्ली में कल हुआ मतदान इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है। अच्छा है मुलायम न सही धन्यवाद उनकी चञ्चल एवं सजग जिह्वा को जिसने उनके काले हृदय की बात को समाज के सामने प्रस्तुत कर कम से कम अपने Gender के साथ justice तो किया। (NOTE:-जिह्वा, रसना आदि जीभ के पर्यायवाची शब्द स्त्रीलिंग हैं, अतः जीभ बेचारी कब तक अपने सहधर्मियों के साथ अन्याय सह सकती थी...जिह्वा तू धन्य है।)

Friday, February 7, 2014

मृगमरीचिका में खोया है वसन्त

वसन्त ऋतु आयी । वसन्तपञ्चमी का उत्सव भी धूमधाम से सम्पन्न हुआ । पीले वस्त्रों ने पीले पुष्पों की रिक्तता के अनुभव को कुछ कम करने का प्रयास किया । साहित्यजगत् से लेकर सामान्य जगत् तक पराग, मकरन्द, किंशुक, सुगन्ध, पुष्प, कोपल, पल्लव, किंजल्क आदि अनेक वासन्ती शब्द सुनायी देने लगे । शब्दों में, कपड़ों में, चित्रों में एक दिन के लिये वसन्त का आभास होंने लगा । इस आभास से मन भी वासन्ती अभा में आभासित हो चला । पर बिना पुष्प देखे, पराग के स्पर्श से आती हुयी वायुपुञ्जों की सुगन्धि का अनुभव किये भला मन कैसे वसन्ती हो सकता है । पत्रा में वसन्त आ जाने से तिथि-परिवर्तन होते ही उत्सव तो प्रारम्भ हो जाता है, पर मानस की वास्तविक उत्सवधर्मिता तो प्रकृति के उत्सव एवं आह्लाद से नियन्त्रित होती है । प्रकृति का आह्लाद ही हृदय एवं मन को उल्लसित कर सकता है । कृत्रिम उल्लास तो चन्द क्षणों का अतिथि होता है, जो उसका आतिथ्य स्वीकार करते ही अपनी आगे की यात्रा हेतु प्रस्थान करता है । प्रकृति के अभाव में कृत्रिमता कबतक वास्तविक आनन्दानुभूति का अभिनय कर सकती है । एक आदर्श अभिनेत्री की भाँति कृत्रिमता अपना लावण्य दिखाकर, अपनी कृत्रिम अनुभूतियों का सुन्दर मञ्चन कर रंगमञ्च से उतनी ही सत्वर गति से चली जाती है जितनी सत्वर गति से उसका आगमन होता है । उसके रंगमंच से प्रस्थान करते ही उसके आगमन से उत्पन्न समस्त उल्लास भी उड़ जाता है । पुनः जीवन उसी भागदौड़ के चक्र में घूमने लगता है ।
यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना मात्र वसन्त के साथ ही नहीं घटती अपितु अब अट्टालिकाओं से सुसज्जित, विद्युत से चमत्कृत, मोटर-गाड़ियों के धुन से गुञ्जित, सीसा मिश्रित लोहे की अवनालिकाओं से सिञ्चित, एल्युमिनियम की चन्द्रिका से आच्छादित, प्लास्टर ऑफ पेरिस एवं एशियन पेण्ट से सुलेपित, पेट्रोल, डीजल के पराग से सुगन्धित, कूड़ा-करकट के पहाड़ों से आवृत्त तथा प्रस्तरजड़ित-ईंटखचित सड़कों, गलियों, वीथियों से अलंकृत नगरों-महानगरों में सभी पर्वों एवं त्योहारों के साथ यह घटना घटती है । वसन्त इसमें कोई अपवाद नहीं है ।

वसन्त कोई मात्र एक त्योहार नहीं अपितु एक नवोन्मेष है । प्रकृति का नवोन्मेष । जगती का नवोन्मेष । एक प्रादुर्भाव, जिसपर सृष्टि टिकी है । एक अंकुर जिसपर प्रकृति का अस्तित्त्व टिका है । एक पल्लव जिसपर मानवता आश्रित है । एक पराग जिसपर जरायुज, अण्डज, उद्भिज एवं स्वेदज तक चिराश्रित हैं । एक स्पन्दन जिसमें जीवन-तत्त्व निहित है । वसन्त एक घटना है । इस सृष्टि ई सूक्ष्मतम एवं महानतम घटना । भारत इस वसन्त की सुन्दर अल्पनाभूमि रहा है । भारतभूमि वसन्त की वासन्ती आभा की वेदिका है जिसमें स्वयं कामदेव रंग भरते हैं । आनादिकाल से जब यह भूमि वसन्त की रमणस्थली रही है । वसन्त यहाँ के कण-कण को आह्लादित करता रहा है । यहाँ वनदेवी के शृंगार से लेकर हृदय-वीणा के झंकार तक का श्रेय वसन्त को दिया जाता रहा है । महानतम कवियों की गिरा वसन्त के गुणगान में श्रान्त नहीं हुयी है अपितु सब्अने वसन्त-वर्णन कर स्वयम् को धन्य माना है । ऋतुओं में इसे ऋतराज का महान् स्थान प्रदान किया गया है । अनंगदेव के सभी पंचशर जिसकी कल्पना भारतीय वाङ्गमय सदैव करता रहा है, उस अनूठीए कल्पना का आधारस्थल वसन्त है , उसकी साकारस्थली वसन्त है । अट्टालिकाओं से दूर कुञ्जों में मुखरित नवजीवन के चिन्ह देखकर, विकसित कलियों एवं विकचित पुष्पों को देखकर एवं उनके स्पर्श से सुगन्धि-निमज्जित वायु का अनुभव कर वसन्त का अनुभव साकार होता है । हृदय उल्लसित हो उठता है, वातावरण प्रसन्नता से भर उठता है और अन्तस्थल की समस्त अनुभूतियाँ साक्षात् होती हैं ।
महाकवि कालिदास ने अपने काव्य-ग्रन्थ ऋतुसंहारम् में षड्-ऋतुओं का वर्णन किया है जिसमें वसन्त का वर्णन सर्वाधिक ललित एवं मनोरम है । कालिदास की सूक्ष्मदृष्टि प्रकृति का गहनतम निरीक्षण करके अपनी दर्शना शक्ति का सम्यक् उपयोग कर वर्णना शक्ति का प्रदर्शन करती है । वसन्त के आगमन मात्र से ही सभी वृक्ष पुष्पों से लद गये हैं, जल में कमल खिल गये हैं अर्थात् सरोवर कमलों से भर गये हैं, स्त्रियाँ सकामा हो गयी हैं, वायु सुगन्धित हो गयी है, सन्ध्याबेला सुहावनी लगने लगी है और दिन सुहावने लगने लगे हैं । वास्तव में वसन्त ऋतु में सब सुरम्य होता है-
द्रुमाः सपुष्पाः सलिलं सपद्मं स्त्रियः सकामाः पवनः सुगन्धिः ।
सुखाः प्रदोषा दिवसाश्च रम्याः सर्वं प्रिये चारुतरं वसन्ते ॥ ऋतुसंहारम्, ६.२
वसन्त में पल्लव, कोपल, मञ्जरियों, कोयलों एवं भ्रमरों का जीवनवृत्त बहुत ही मनोरम दृश्य उपस्थित करता है । प्रकृति की नूतनता को, उनकी नवलता को साकार करने का चिन्ह इन्हीं आलम्बनों में निहित है । कालिदास ऋतुसंहारम् में इनकी अवस्था का बहुत सुन्दर चित्रण करते हैं । लाल कोंपलों के गुच्छों से झुके हुये और सुन्दर मञ्जरियों से लदी शाखाओं वाले आम के वृक्ष जब पवन के झोकें में हिलने लगते हैं, तो उन्हें देख-देखकर अंगनाओं के मन उत्सुकता से भर उठते हैं –
ताम्रप्रवालस्तबकावनम्राश्चूतद्रुमाः पुष्पितचारुशाखाः ।
      कुर्वन्ति कामं पवनावधूताः पर्युत्सुकं मानसमङ्गनानाम् ॥ ऋतुसंहारम्, ६.१७

किंशुक वसन्त के आगमन का प्रतीक एवं साहित्य में अत्यधिक वर्णित पुष्प है । इसे पलाश, ढाक एवम् टेसू आदि अन्य नामों से भी जानते हैं । इसकी अद्भुत सौन्दर्य वसन्त-ऋतु का स्वयमेव बखान करता है । कालिदास वसन्तऋतु-वर्णन प्रसंग में किंशुकवनों के सौन्दर्य का अप्रतिम वर्णन करते हैं कि किंशुकवन में वृक्षों की फूली हुयी शाखायें आग की लपटों के समान प्रज्वलित हो रही हैं और पृथ्वी उन किंशुकवनों की सुन्दरता में ऐसे आवृत्त है जैसे वह लाल साड़ी पहने हुये कोई नववधू हो –
आदीप्तवह्निसदृशैएमरुताऽवधूतैः सर्वत्र किंशुकवनैः कुसुमावनम्रैः ।
  सद्यो वसन्तसमयेन समाचितेयं रक्तांशुका नववधूरिव भाति भूमिः ॥ ऋतुसंहारम्, ६.२१
वसन्तऋतु सभी के लिये आनन्ददायक है, समस्त मनों की आह्लादक है । कालिदास के वर्णन में पर्वतों की चोटियाँ एक छोर से दूसरे छोर तक पुष्पों से ढँकी हुयी हैं । सर्वत्र फूलों से लदे वृक्ष खड़े हैं । पथेरीले पहाड़ों में भी फूल खिले हुये हैं । कोयल की कूक और भौरों के गुञ्जार से वातावरण  आनन्दित है –
नानामनोज्ञकुसुमद्रुमभूषितान्ता-
न्हृष्टान्यपुष्टनिनदाकुलसानुदेशान् ।
शैलेयजालपरिणद्धशिलातलान्ता-
न्दृष्ट्वा नतः क्षितिभृतो मुदमेति सर्वः ॥ ऋतुसंहारम्, ६.२७
वसन्तऋतु अनंगदेव की ऋतु मानी जाती है । ऐसा माना जाता है कि कामदेव अपने पाँचों बाणों के साथ वसन्त ऋतु में उपस्थित होते हैं । कुसुमायुध का आलम्बन बनने के लिये आवश्यक वातावरण का वसन्तऋतु प्रस्तुतीकरण करती है ।रमणीय सन्ध्याबेला, पसरी हुयी चन्द्रिका, कोयल की कूक, सुगन्धित पवन, मतवाले भ्रमरवृंद की गुंजार और रात्रिकाल में आसवपान ये सब कालिदास की दृष्टि में कामदेव को जगाये रखनेवाली रसायन हैं –
रम्यः प्रदोषसमयः स्फुटचन्द्रभासः
पुँस्कोकिलस्य विरुतं पवनः सुगन्धिः
मत्तालियूथविरुतं निशि सीधुपानं
 सर्व रसायनमिदं कुसुमायुधस्य ॥ ऋतुसंहारम्, ६.३५
इस प्रकार वसन्त का रम्य वर्णन करते हुये महाकवि कालिदास कामना करते हैं कि मन्द-मन्द पवनों से शृंगार की शिक्षा देने वाला काअम का मित्र वसन्त सबको सदा प्रसन्न रखे –
शृंगारदीक्षागुरुः कल्पान्तः मदनप्रियो दिशतु वः पुष्पागमों मङ्गलम् ॥, ऋतुसंहारम्, ६.३६
कवियों की सर्जनाशक्ति का एक प्रमुख सोपान रहा है वसन्त-वर्णन । इतना रमणीक वातावरण, इतनी चारु प्रकृति-व्यवस्था एवं इतनी मनोहर अवस्था अन्य किसी ऋतु में दुर्लभ है । यहाँ सब नवीन है, सर्वत्र नवीन है । इसीलिये इस नवीनता एवं चारुता का वर्णन एवं दर्शन कवियों का एक महत्त्वपूर्ण विषय रहा है ।
हिन्दीसाहित्य में कवि पद्माकर ने वसन्त की सार्वत्रिक उपस्थित बताते हुये उसका सुन्दर वर्णन किया है-
कूलन में, केलि में, कछारन में, कुञ्जनमें,
क्यारिन में, कलिन में, कलीन किलकन्त है ।
कहें पद्माहर परागन में पौनहू में,
पानन में, पीक में, पलासन पगंत है ।
द्वार में, दिसान में, दुनी में, देस-देसन में,
देखौ दीप-दीपन में , दीपत दिगंत है ।
बीथिन में, ब्रज में, नवेलिन में, बेलिन में
बनन में, बागन में, बगर् यो बसन्त है ॥
आज इन सभी रूपों में वसन्त की उपस्थिति देख पाना असम्भव प्रतीत होता है । दूर कहीं वनों में, कुञ्जों में, ग्रामों में एवं उनके उद्यानों में इस वर्णन का आंशिक दर्शन अवश्य सम्भव है । भारत रमणीक भूमि रही है और आज भी है । आज इसके सौन्दर्य एवं सुषमा में संकुचन के पश्चात भी यह अपनी रमणीयता से वञ्चित कदापि नहीं है । अभी भी नगराज हिमालय इसके सौन्दार्य में निरन्तर वृद्धि करता हुआ अडिग खड़ा है । सदानीरा जाह्नवी इसकी जीवनी शक्ति के निरन्तर वर्द्धन हेतु सतत् प्रवाहित हैं । सह्याद्रि से लेकर आराकानयोमा तक विभिन्न पर्वतमालायें एवं पर्वतशिखर इस भारतभूमि को नानाप्रकार के दृश्यों एवं रत्नों से परिपूर्ण करते हैं । पर्वतराज हिमालय से सिन्धुराज हिन्दमहासागर तक, कच्छ के गम्भीर रण से अरुणाचल प्रदेश की अचल सुषमा तक समस्त सौन्दर्य इसी भारतभूमि में प्राणभूत होकर समाहित है । ऋतुराज भारतमाता के सर्वविधि सर्वांश शृंगार हेतु अपनी समग्रता के साथ प्रतिवर्ष प्रस्तुत होता है एवं माँ की ललित छवि का निर्माण करता है, उसके अप्रतिम सौन्दर्य को उद्घाटित करता है । यह वसन्तऋतु प्रतिवर्ष मात्र वर्तमान राजनैतिक सीमाओं से आबद्ध भारत ही नहीं अपितु उस अखण्ड भारतभू को निःसंकोच अपने अतुल सामर्थ्य से अलंकृत करती है जिसे “आसिन्धुसिन्धुपर्यन्ता” कहा गया है ।
आज वसन्त का सम्यक् दर्शन न होंने पर भी संस्कृति का प्रवाह वसन्तागमन पर स्वागत हेतु जनमानस में अद्भुत वात्सल्य का सृजन करता है । अट्टालिकाओं के आवरण में दर्शन से वञ्चित रहने पर भी मन को वसन्त-दर्शन हेतु आकुल करता है और बाहर प्रकृति की गोद में निकलकर विचरण करने का आह्वान् करता है । निरन्तर चलायमान, गतिशील जीवन की गति को थामकर कुछ समय आत्मानुभव हेतु मातृवत् प्रोत्साहन देती है वसन्तऋतु । न चाहते हुये भी, अन्यमनस्क भाव से ही सही एक हार्दिक स्पन्दन सृजित करती है वसन्तऋतु । एक ऊर्जा, एक गति, एक लय, एक ताल, एक छन्द का अनुबन्ध करती है यह ऋतु, जिसकी अवहेलना किसी के वश की बात नहीं ।
जीवनपद्धति में परिवर्तन के साथ-साथ आवश्यकताओं में भी परिवर्तन होता है । आवश्यकताओं में परिवर्तन होंने से आसपास का वातावरण परिवर्तित होता है । आज हमारा समाज एवं देश ही नहीं अपितु पूरा विश्व एक बड़े परिवर्तन का साक्षी बन रहा है । जिसमें दिशायें बदल रही हैं, दशा भी बदल रही है और उसके साथ-साथ सौन्दर्य में भी परिवर्तन हो रहा है । आज के सौन्दर्य में सुख का आभास होता है । एक चटक चमक है जो प्राकृतिक सौन्दर्य की अपेक्षा बहुत महान् प्रतीत होती है । उसके पीछे भागने और उसे पाने में जीवन साकार प्रतीत होता है और सब उसी का पीछा करते हुये भागते रहते हैं ।  सर्वत्र एक उथल-पुथल है, एक आकांक्षा है  और कुछ नया पाने की इच्छा है । सभी को वर्णना-शक्ति प्रिय है परन्तु दर्शना-शक्ति के सृजन के लिये किसी के पास समय नहीं है । यदि कदाचित् किसी के पास समय है भी तो वह आलम्बन, उद्दीपन एवम् सहज सौन्दर्य दुर्लभ है जो कालिदास को अथवा पद्माकर को सुलभ था और आज जो कदाचित् घाव के किसी रग्घू को भी सुलभ है । आज सर्जना सिमटकर रह गयी है महानगरों की मेखलाओं तक उसकी स्वर्णजाड़ित परिधि तक और दर्शना शक्ति कहीं दूर किसी पहाड़ी गुहा में जाकर खो जाने को विवश है ।
यहाँ वास्तविकता यह है कि जो आज बहुत ही चमकदार, चटक और चकाचौंधीं प्रतीत हो रहा है वास्तव में वह जलबिन्दु नहीं सत्व नहीं अपितु मृगमरीचिका है, जिसमें जीवन भटक रहा है और जिसके अन्त में मात्र श्रान्ति ही हाथ लगनी है । इस मरीचिका का बोध भी उस बेला में होना है जब कुछ भी शेष रहने का

 अवकाश भी न रहे । इस दौड़ में सब भाग रहे हैं, किसी के पास विश्राम का समय तक नहीं हैं । एक पल रुककर कुछ सोचने तथा देखने का अवकाश नहीं है, बस बुनने की, बनाने की और सृजन की इच्छा है । सृजनेच्छा, दर्शनेच्छा के बिना पूरी ही नहीं हो सकती । इसलिये हर सृजन भग्न है, हर सृजन अधूरा है, हर सृजन अकेला है । सब कुछ अपेक्षित होकर भी उपेक्षित है । इसीलिये आज वसन्त भी अनायास ही उपेक्षित है । न वह सौन्दर्य है, न वे पलाश, वे किंशुक, वे आम्रमञ्जरियाँ, वे कोयले, वे भ्रमर और न ही उनमें रसानुभूति की प्रतिभा । सब नीरस में रस खोज रहे हैं । नीरस को सरस बनाने का उपाय ढूढ़ रहे हैं । इसी मृगमरीचिका में खोया है वसन्त !