Monday, November 27, 2017

नदी मात्र जलधारा नहीं है

चँदहा
नदी मात्र प्रवाहित जलधारा नहीं अपितु साक्षात् जीवनधारा है। यही कारण है कि सभी प्राचीन सभ्यतायें नदीतटों पर ही विकसित हुयीं। नदियों तथा जल के विविध रूपों के वर्णन से समग्र साहित्य ओतप्रोत है। भारतीय ग्रामविन्यास से लेकर नगरविन्यास तक सभी संरचनाओं के मूल में नदी और उसकी प्रवाहित अविरल धारा है। ऐसे स्थान के लिए जहाँ नदी उपलब्ध नहीं थी पुष्कर/पोखर, सगरा और ताल खोदवाया जाता था जिसमें पावन गंगा सहित विभिन्न नदियों का जल मिलाया जाता था। ऐसा इसलिए था ताकि उस कृत्रिम जलाशय के लिए भी लोकमानस में नदीवत् श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो सके। भारतीय जीवन के आचमन से लेकर विसर्जन तक सारे क्रियाकलाप नदीजल केन्द्रित हैं। ऐसा लगता है नदी ही सबका उत्स है और नदी ही अन्तिम अधिष्ठान है। कूप, वापी, तडाग, पुष्कर सारे शब्द जल-अधिष्ठान से संबंधित हैं और विभिन्न जलधारक - व्यवस्थाओं को सूचित करते हैं। इन सभी कृत्रिम जलधारक - व्यवस्थाओं के माध्यम से भूमिगत जल और प्रत्यक्ष जल को व्यवस्थित किया जाता था। वर्षाऋतु का प्रचुर जल का इन सभी ताल-पोखर-झील आदि के माध्यम से पुनर्भरण-पुनर्चक्रण होता था। कुएं आदि की व्यवस्था के कारण जल का उपयोग भी नियमित और संयमित था। अंधाधुंध शोषण का तो प्रश्न ही नहीं था। ऐसे में एक लोटा जल का मूल्य जनमानस को ज्ञात था। प्रकृति और मनुष्य में एक पारस्परिकता थी। आधुनिक विज्ञान की उन्नति और मानव - सभ्यता की सभ्य परिभाषा के उदय से जीवन के मूलभूत तत्त्व सस्ते होकर मूल्य खोते गये। जल जो पहले नदी, ताल, पोखर, झील, कूप का विषय था नल (handpump) तो आ पहुंचा। फिर हैंडपंप से वह कब पानी की टंकी, पाइपलाइन से होते हुए बोतल में बंद हो गया... पता ही नहीं चला। आज स्थिति यह है कि महानगरों, रेलवे स्टेशनों से निकलकर बोतलबंद पानी गांवों के घर-आँगन तक पहुंच गया है। कुछ लोगों को तो उसका ऐसा स्वाद लगा है कि उन्हें शुद्ध पेयजल जो किसी विशेष साधन से प्रसाधित नहीं है, अशुद्ध लगता है। शुद्ध पेयजल के अभाव में रोग एक अलग विस्तृत विषय है। ताल, पोखय, झील यहाँ तक कि नदीजल वितरिकायें औ वर्षाजल धारण गड़हे /गड्ढे तक अस्तित्वहीन हो रहे हैं। ताल सोखकर अट्टालिकायें खड़ी हो गयी हैं। नदियों के तटबंधों पर कंक्रीट के पहरे लगा दिये गये हैं। नदीतट की प्राकृतिक वनस्पतियों औ वृक्षससंदा हो विस्थापित कर अपरिचित सुसज्जित वृक्षों से डेकोरेशन पर बल दिया जा रहा है। नदियों को इस प्रकार नियंत्रित किया जा रहा है कि वे अमर्यादित हो नाशलीला रचें तथा सबकुछ समाप्त कर अपने तटबंधों की पुनर्रचना करें।
भूमिगत जल के असीम अनवरत अवशोषण स धरती का अंतस् सूख गया है और जिसप्रकार मानव शरीर जब निर्जल होता है तो सर्वाधिक सोडियम रोमछिद्रों से बाहर निकलता है, शरीर निढाल हो जाता है वैसे ही धरती के साथ भी है, भूमिगत जल के दोहन और अवशोषण से धरती का हृदय रिक्त हो गया है। लम्बे समय से केशिकी क्रिया (कैपिलरी एक्शन) से धरती का नमक और आकर भूमि को अम्लीय-क्षारीय व बंध्या बना रहा है। अर्घ्य और आचमन के लिए भी वहां शुद्धजल का अभाव होता जा रहा है जो क्षेत्र सदानीरा नदियों की गोद में बस बसे हैं। इस तरह ये बात अभिधेयार्थ में ही सच हो रही है कि -

कभी गर्मी, कभी सर्दी, ये तो कुदरत के नजारे हैं।
सुना है वे भी प्यासे हैं जो नदी के किनारे हैं।।

आज स्वच्छ जल और नदी संरक्षण के लिए शासन-प्रशासन सहित समाज अभियानरत है। सबके शब्दों में चिंता है संरक्षण की। प्रयास भी हो रहे हैं... परन्तु फिर भी चिंता कम होने के आसार नहीं हैं। अभियानों में यद्यपि बहुत से ऐसे लोग जुड़े हैं जो सच में चिंतित हैं और प्रसिद्धिपरांगमुख हो जलहित जीवन समर्पित कर दिया है। परन्तु साथ ही नदी संरक्षण के नाम पर नदी तटों पर फोटो खिंचवाने वाले, लच्छेदार भाषण देने वाले ऐसे बेईमान बेईमान धूर्त लोग भी सम्मिलित हैं जिन्होंने बिना आवाज़ किये ताल-तलैया-झील पी लिया है। नदीतटों को निगल लिया है।
आज जल इतना चुनौतीपूर्ण विषय बन गया है कि उसके विषय में टुकड़े - टुकड़े में न सोचकर समग्र रूप में सोचना होगा। नदी ताल झील सबके लिए एकसाथ काम करना होगा। तालों को पुनर्जीवित करना होगा। धरती के अंतस् को पुनः सिक्त करना होगा। और सबसे बड़ी बात फोटोबाजी से बाहर निकलकर एक कदम ही सही पर ईमानदारी से चलना होगा।

Saturday, November 25, 2017

स्वच्छता: सामाजिक उत्तरदायित्व

साभार:Google 
स्वच्छता स्वास्थ्य हेतु अपरिहार्य कारक है। वर्तमान समय में प्रदूषण तो एक ज्वलंत समस्या है ही साथ ही साथ हमारे आसपास के वातावरण की स्वच्छता भी बड़ी चुनौती है। भारत इस चुनौती से लगातार जूझ रहा है। एक तरफ इसके समाधान हेतु शासन-प्रशासन द्वारा 'स्वच्छ भारत अभियान' जैसी पहल हुयी है दूसरी तरफ अस्वच्छता बढ़ती जा रही है उसमें आशानुसार कमी नहीं आ रही। स्वच्छ रहन-सहन जीवन को नीरोग तथा स्वस्थ बनाता है जिससे विभिन्न प्रकार की मानसिक, शारीरिक व सामाजिक समस्यायें नहीं पनपने पातीं। मानसिक समस्याओं पर यदि हम ध्यान दें और उनका गहन अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि उनके मूल में अस्वच्छता और मलिनता अवश्य है। यदि हम यह कहें कि अस्वच्छता हमें अस्वस्थ बनाती है और मलिनता हमारे तन-मन-जीवन को म्लान करती है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। आज हमें इस बात पर विचार करना होगा कि 'स्वच्छ भारत अभियान' जैसे उन्नत अभियान चलने पर भी हम स्वच्छ क्यों नहीं हो रहे। क्या मलिनता हमारे मानस में घर कर गयी है? वे कौन-कौन से कारक है जो परोक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से हमारे मालिन्य को बनाये रखने में सहायक हैं तथा स्वच्छता की ओर कदम बढ़ाने में बेड़ी सिद्ध हो रहे हैं। स्वच्छता राजनीतिक नहीं अपितु सामाजिक प्रश्न है। सामाजिक चुनौती है। इस चुनौती का प्रत्युत्तर-क्रम व्यक्ति - परिवार-समाज-राष्ट्र है। अतः स्वच्छता हेतु सर्वप्रथम व्यक्ति का हृदय-परिवर्तन होना चाहिये। उसके मलिन व दूषित दृष्टि तथा विचारों का परिष्कार होना चाहिए। क्योंकि यह बात सिद्ध है कि पहले जगत् की रचना, परिदृश्य व वातावरण की रचना मानस में होती है और फिर वह मानस के माध्यम से व्यक्ति के आचरण में परिलक्षित होता है। अतः सुधार तथा जागरण वहाँ आवश्यक है जहाँ अस्वच्छता, अशौच रिपोर्ट मालिन्य की सर्जना होती है। विभिन्न अभियानों, जागरूकता कार्यक्रमों, प्रतिज्ञाओं के बाद भी यदि आज हम तनिक भी लक्ष्य नहीं पूरा कर पा रहे हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि हम उस स्थान पर प्रहार नहीं कर रहे जो समस्या का उत्स है, मर्मबिन्दु है। वह स्थान है व्यक्ति का मानस, उसके विचार, उसकी दृष्टि।
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भारत जैसे देश की, जो बाह्य ही नहीं अपितु आंतरिक स्वच्छता, शुचिता के दर्शन का प्रवर्तक व व्यवहारक रहा है, आज स्वच्छता अभियान चलाते और मलिनता पर व्यथित होते देखकर आश्चर्य होता है कि 'बाह्याभ्यंतर शुचिः' की प्रतिज्ञा से किसी कार्य का प्रारम्भ करने वाले भरतपुत्रों की यह पीढ़ी आखिर किस ओर ताक रही है, किस विनाश का मार्ग प्रशस्त कर रही है। आखिर भारतीय इतने मलिन, स्तरहीन व स्थितिच्युत क्यों और कैसे हुये? वह कौन सा कारक है जिसके कारण ये हश्र हुआ स्वच्छता के प्रति हमारी उन्नत सोच का? क्या कारण है कि जिस संस्कृति का आयुर्वेद शास्त्र ही नहीं अपितु समाज 'उच्छिष्ट' अर्थात् जूठा भोजन न करने की बारम्बार वर्जना करता रहा। यहां तक कि अपना ही जूठा भोजन व पान न करने का निर्देश पीढ़ी दर पीढ़ी देता रहा। वहीं समाज अपने आसपास की स्वच्छता के विषय में इतना मूक, मौन तथा अविवेकी कैसे हो गया। इस प्रवृत्ति को समझने के लिए और इस अवनतिगामी तथाकथित विकास को जानने के लिये निश्चय ही हमें इतिहास के अनेक पृष्ठ खंगालने पड़ेंगे। उसके स्वर्ण-स्याम, मंडित-कलुषित पृष्ठों का अवलोकन करना पड़ेगा। यहाँ पर एक महत्वपूर्ण बात का उल्लेख बहुत प्रासंगिक लगता है मुझे - अभी कुछ दिन पूर्व मुझे सौभाग्य से एक यात्रा-वृत्तान्त पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह यात्रा-वृत्तान्त कश्मीरी की यात्रा पर केन्द्रित है। जिसमें कानपुर से कश्मीर तक यात्रा का विवरण - वर्णन है। वर्ष 1920 में यह यात्रा सम्पन्न हुयी। जब जलियांवाला कांड हुये कुछ ही दिन व्यतीत हुये थे। यात्रा-वृत्तान्त का शीर्षक है-'मेरी काश्मीर यात्रा' इसके लेखक 'मथुराप्रसाद पाण्डेय' हैं। इस पुस्तक में लेखक ने तात्कालीन कश्मीर का वर्णन किया है। इस वर्णन में एक विशिष्ट बात उन्होंने लिखी है जो श्रीनगर के निवासियों के विषय में है। यह बात विचारणीय व वर्तमान में आश्चर्यजनक है। उसका उल्लेख यहाँ स्वच्छता के संदर्भ में करना प्रासंगिक है। लेखक ने लिखा है कि "शहर की सड़कें और गलियाँ जगह जगह पत्थरों से पटी हुई हैं, जिनको प्रायः कश्मीरी लोग मल मूत्र से परिपूर्ण रखते हैं। एक दिन मैंने यहाँ के एक निवासी से इस बात का कारण पूछा जिसने एक अद्भुत उत्तर दिया। उत्तर को सुनकर मुझे बहुत विस्मय हुआ और हँसी आयी। उसने कहा" यह हमारे देश का शुभ मुहूर्त्त है। जिसके दरवाजे पर ज्यादा मैला देखते हैं उसी के यहाँ वर की खोज करते हैं। मैला ज्यादा इकट्ठा देखकर हम लोग यह ख्याल करते हैं कि इस दरवाजे के मालिक के यहाँ खाने को काफी है।" '(पृष्ठ - 83)
यह बात सच में बहुत विस्मयकारी है कि मैला देखकर खाद्य-सम्पन्न होने का अनुमान लगाया जाये। परन्तु यह अलग-अलग समाज की सोच है जिसमें निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। आज कश्मीर में ऐसी प्रथा के शायद ही अवशेष दिखें। यहाँ वृत्तांत के उल्लेख का अभिप्राय बस इतना है कि कतिपय ऐतिहासिक कारण भी गंदगी की प्रवृत्ति के लिए उत्तरदायी हैं।
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यह बात भी सत्य है कि सुरसा के मुख की भाँति दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती जनसंख्या तो है ही विभिन्न सामाजिक-पर्यावरणीय समस्याओं के मूल में। एक छोटे से भूभाग पर आवश्यकता और क्षमता से अधिक जन-दबाव गंदगी का अम्बार लगाता है। प्रकृति में जितनी संख्या में प्राकृतिक और कृत्रिम अपघटक हैं उससे कई गुना अधिक उपभोग के कारण भी हमारे आसपास का वातावरण कूड़ा-करकट की विभिन्न झाँकियों से विकृत है। इसीलिए अस्वच्छ व मलिन रहने के लिए समाज खासकर नगरीय - महानगरीय समाज विवश है। वर्तमान में विवशता की यह स्थिति उन उत्पादों की अधिकता से जिनका क्षरण व अपघटन नहीं होता-गाँवों व सुदूर पहाड़ों, दीपों व घाटियों तक पहुंच गयी है। तोअब स्थिति यह है कि कब - कभी नगर-महानगर से अधिक अस्वच्छ गाँव का वातावरण दिखता है।
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ग्रामीण जीवन का स्वच्छता का सहज चक्र जो अपशिष्ट को अपघटित कर खाद बनाकर, फसलों को जीवनदान देकर पुनर्जन्म लेता था, बाधित हो गया है। खेत कृत्रिम खादों, उर्वरकों से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं और गाँव के सौन्दर्य को कूड़े का पहाड़ निगल रहा है। घूर जो जब तक घूरने की स्थिति तक पहुँचते थे, तबतक खेत में खाद बनकर पहुँच जाते थे, आज पहाड़ बनकर घूर ही नहीं रहे हैं अपितु आँख तरेर रहे हैं। यही कारण है कि गाँव का प्राकृतिक वातावरण भी विषाक्त हो गया है। पक्षियों व की - पतंगों की संख्या में तेजी से गिरावट आयी है। उपज का सुस्वाद अब कटु हो गया है और ग्रामीण जीवन बीमारियों से ग्रस्त हो रहा है। अस्वच्छता प्रदूषण के भयंकर स्तर तक बढ़ गयी है। 

अष्टाङ्गहृदयम्

चित्र: साभार Google 
अष्टांगहृदयम् आयुर्वेदाचार्य वाग्भट द्वारा विरचित आयुर्वेद-ग्रंथ है। यह ग्रंथ भारतीय आयुर्वेदशास्त्र के बृहतत्रयी के अन्तर्गत परिगणित होती है। वाग्भट ने अष्टांगहृदयम् के अतिरिक्त अष्टांगसंग्रह नामक एक अन्य आयुर्वेद ग्रंथ की रचना भी की। जो विद्वानों के मत में अष्टांगहृदयम् के पूर्व की रचना है। प्रचीन परम्परा में कतिपय उदाहरण ऐसे भी प्राप्त हुये हैं जहाँ पौत्र का नामकरण पितामह के नाम के आधार पर अथवा उन्हीं के नाम पर हुआ है। अतः अनेक विद्वान् वृद्ध वाग्भट और अष्टांगहृदयम् के रचयिता वाग्भट दो पृथक् व्यक्तित्व मानते हैं। परन्तु जब परम्परा में ग्रंथ - रचना प्रक्रिया देखी जाय तो हमें ज्ञात होगा कि विभिन्न विद्वानों ने एक ही विषय पर लघु अथवा सारांश लेखन किया है स्वयं उसी विषय पर व्याख्यापरक लेखन भी किया है जैसे नागेश द्वारा रचित मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा। अतः संभव है कि वाग्भट एक ही व्यक्ति का नाम था। अधिकांश विद्वान् इस तर्क के समर्थक भी हैं। वाग्भट का समय 550ईस्वी सन् विभिन्न विद्वान् मानते है। वाग्भट के 'अष्टांगहृदयम्' का उल्लेख चीनी यात्री ईत्सिंग ने अपने यात्रा-वृत्तान्त में किया है। ईत्सिंग की भारतयात्रा का समय 671-695 ईस्वी है अतः तब तक 'अष्टांगहृदयम्' का व्यापक प्रचार-प्रसार हो चुका था तथा उसे लोकप्रसिद्धि भी मिल चुकी थी। 'अष्टांगहृदयम्' पर वराहमिहिर के ज्योतिष-सिद्धान्तों का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। चूंकि का समय 505-587 ईस्वी है अतः वराहमिहिर के समकालीन अथवा उसके बाद अष्टांगहृदयम् की रचना हुयी होगी। अतः वाग्भट का काल 5वीं 6ठी शताब्दी ईस्वी निर्धारित किया गया है।
'अष्टांगहृदयम् 'एक बृहद् आयुर्वेद ग्रंथ है। इसके नामकरण कि आधार आयुर्वेद के आठ अङ्ग हैं-"कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान्। अष्टावङ्गानि।" अर्थात् 
1.कायचिकात्सातंत्र, 
2. बाल(कौमारभृत्य) तन्त्र, 
3. ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या), 
4. ऊर्ध्वांगचिकित्सा (शालाक्य) तन्त्र, 
5. शल्यचिकित्सा (शल्यतन्त्र), 
6.दंष्ट्रा विषचिकित्स् (अगदतन्त्र) 
7.जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र), 
8. वृषचिकित्सा (वाजीकरण)। 
आयुर्वेद के ये आठों अंग चिकित्सा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि इनमें से कायचिकितसा अधिक समादृत व बहु - वर्णित है।
वाग्भट ने आचार्य सुश्रुत की भाँति अपने ग्रंथ को छः भागों में विभक्त किया है जिनको 'स्थानम्' की संज्ञा दी है। वे 'स्थानम्' हैं -
1.सूत्रस्थानम्
2. शारीरस्थानम्
3. निदानस्थानम्
4. चिकात्सास्थानम्
5. कल्प-सिद्धिस्थानम्
6. उत्तरस्थानम्
 अष्टांगहृदयम् के ये सातों 'स्थानम्' पुनः विषयानुसार अध्यायों में विभक्त हैं और कुछ अध्याय पुनः वर्गों में विभक्त  हैं। यहाँ। उनका विवरण प्रस्तुत किया जाता है:-
सूत्रस्थानम्:-
1.आयुष्कामीयाध्याय:
2.दिनचर्याध्यायः
3.ऋतुचर्याध्यायः
4.रोगानुत्पादनीयाध्यायः
5.द्रवद्रवकयविज्ञानीयाध्यायः- तोयवर्ग, क्षीरवर्ग, इक्षुवर्ग, मधुवर्ग, तैलवर्ग, मद्यवर्ग, मूत्रवर्ग।
6.अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः - शूकधान्यवर्ग, शिम्बीधान्यवर्ग, कृतान्नवर्ग, मांसवर्ग, शाकवर्ग, फलवर्ग, औषधवर्ग।
7.अन्नरक्षाध्यायः
8.मात्राऽशितीयाध्यायः
9.द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः
10.रसभेदीयाध्यायः
11.दोषादिविज्ञानीयाध्यायः
12.दोषभेदीयाध्यायः
13.दोषोपक्रमणीयाध्यायः
14.द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः
15.शोधनादिगणसंग्रहाध्यायः
16.स्नेहविधिरध्यायः
17.स्वेदविधिरध्यायः
18.वमन-विरेचन-विधिरध्यायः
19.बस्तिविधिरध्यायः
20.नस्यविधिरध्यायः
21.धूमपानविधिरध्यायः
22.गण्डूषादिविधिरध्यायः
23.आश्चोतनाञ्जनविधिरध्यायः
24.तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः
25.यन्त्रविधिरध्यायः
26.शस्त्रविधिरध्यायः
27.सिराव्यधविधिरध्यायः
28.शल्याहरणविधिरध्यायः
29.शस्त्रकर्मविधिरध्यायः।
30.क्षाराग्निकर्मविधिरध्यायः
शारीरस्थानम् :-
1.गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः
2.गर्भव्यापच्छारीराध्यायः
3.अंगविभागशारीराध्यायः
4.मर्मविभागशारीराध्यायः
5.विकृतिविज्ञानीयशारीराध्यायः
6.दूतादिविज्ञानीयशारीराध्यायः
निदानस्थानम् :-
1.सर्वरोगनिदानाध्यायः
2.ज्वरनिदानाध्यायः
3.रक्तपित्तकासनिदानाध्यायः
4.श्वासहिध्मानिदानाध्यायः
5.राजयक्ष्मादिनिदानाध्यायः - स्वरभेद-निदान, अरोचक-निदान, छर्दि - निदान, हृद्रोग-निदान, तृष्णा-निदान
6.मदात्ययादिनिदानाध्यायः - मद-निदान, मूर्च्छाय-निदान, संन्यास-निदान
7. अर्शोनिदानाध्यायः
8.अतिसारग्रहणीदोषनिदानाध्यायः - अतिसार-निदान, ग्रहणी-निदान
9. मूत्राघातनिदानाध्यायः - अश्मरीरोग
10.प्रमेहनिदानाध्यः
11.विद्रधि-वृद्धि-गुल्मनिदानाध्यायः - वृद्धिनिदान, गुल्मनिदान, आनाहनिदान
12.उदरनिदानाध्यायः
13.पाण्डुरोगशोफविसर्पनिदानाध्यायः - पाण्डुरोग-निदान, शोफनिदान, विसर्पनिदान
14.कुष्ठश्वित्रक्रिमिनिदानाध्यायः - कुष्ठरोग-निदान, श्वित्रनिदान, क्रिमिनिदान
15.वातव्याधिनिदानाध्यायः
16.वातशोणितनिदानाध्यायः
चिकित्सास्थानम्
1.ज्वरचिकित्साध्यायः
2.रक्तपित्तचिकित्साध्यायः
3.कासचिकित्साध्यायः
4.श्वासहिध्माचिकित्साध्यायः
5.राजयक्ष्मादिचिकित्साध्यायः - स्वरसाद-चिकित्सा, अरोचक-चिकित्सा
6.छर्दि-हृद्रोग-तृष्णाचिकित्साध्यायः-हृदयरोग-चिकित्सा, तृष्णा-चिकित्सा 
7.मदात्ययादिचिकित्साध्यायः-मदमूर्च्छाय-चिकित्सा, सन्न्यास-चिकित्सा
8.अर्शश्चिकित्साध्यायः
9.अतिसारचिकित्साध्यायः
10.ग्रहणीदोषचिकित्साध्यायः
11.मूत्राघातचिकित्साध्यायः
12.प्रमेहचिकित्साध्यायः
13.विद्रधि-वृद्धिचिकित्साध्यायः
14.गुल्मचिकित्साध्यायः
15.उदरचिकित्साध्यायः
16.पाण्डुरोगचिकित्साध्यायः
17.श्वयथुचिकित्साध्यायः
18.विसर्पचिकित्साध्यायः
19.कुष्ठचिकित्साध्यायः
20.श्वित्रक्रिमिचिकित्साध्यायः
21.वातव्याधिचिकित्साध्यायः
22.वातशोणितचिकित्साध्यायः
कल्प-सिद्धिस्थानम् :-
1.वमनकल्पाध्यायः
2.विरेचनकल्पाध्यायः
3.वमनविरेचनव्यापत्सिद्धिरध्यायः
4.बस्तिकल्पाध्यायः
5.बस्तिव्यापत्सिद्धिरध्यायः
6.द्रवकल्पाध्यायः
उत्तरस्थानम् :-
1.बालोपचरणीयाध्यायः
2.बालामयप्रतिषेधाध्यायः
3.बालग्रहप्रतिषेधाध्यायः
4.भूतविज्ञानीयाध्यायः
5.भूतप्रतिषेधाध्यायः
6.उन्मादप्रतिषेधाध्यायः
7.अपस्मारप्रतिषेधाध्यायः
8.वर्त्मरोगविज्ञानीयाध्यायः
9.वर्त्मरोगप्रतिषेधाध्यायः
10.सन्धिसितासितरोगविज्ञानीयाध्यायः
11.सन्धिसितासितरोगप्रतिषेधाध्यायः
12.दृष्टिरोगविज्ञानीयाध्यायः
13.तिमिरप्रतिषेधाध्यायः
14.लिंगनाशप्रतिषेधाध्यायः
15.सर्वाक्षिरोगविज्ञानीयाध्यायः
16.सर्वाक्षिरोगप्रतिषेधाध्यायः
17.कर्णरोगविज्ञानीयाध्यायः
18.कर्णरोगप्रतिषेधाध्यायः
19.नासारोगविज्ञानीयाध्यायः
20.नासारोगप्रतिषेधाध्यायः
21.मुखरोगविज्ञानीयाध्यायः
22.मुखरोगप्रतिषेधाध्यायः
23.शिरोरोगविज्ञानीयाध्यायः
24.शिरोरोगप्रतिषेधाध्यायः
25.व्रणप्रतिषेधाध्यायः
26.सद्योव्रणप्रतिषेधाध्यायः
27.भङ्गप्रतिषेधाध्यायः
28.भगन्दरप्रतिषेधाध्यायः
29.ग्रन्थ्यर्बुदश्लीपदापचीनाडीविज्ञानीयाध्यायः
30.ग्रन्थ्यर्बुदश्लीपदापचीनाडीप्रतिषेधाध्यायः
31.क्षुद्ररोगविज्ञानीयाध्यायः
32.क्षुद्ररोगप्रतिषेधाध्यायः
33.गुह्यरोगविज्ञानीयाध्यायः
34.गुह्यरोगप्रतिषेधाध्यायः
35.विषप्रतिषेधाध्यायः
36.सर्पविषप्रतिषेधाध्यायः
37.कीटलूतादिविषप्रतिषेधाध्यायः
38.मूषिकालर्कविषप्रतिषेधाध्यायः
39.रसायनविधिरध्यायः
40.वाजीकरणविधिरध्यायः
इस प्रकार 'अष्टांगहृदयम्' छः भागों में विभक्त है। वाग्भट ने स्वयं कहा है कि इस ग्रंथ में चरकसंहिता एवं सुश्रुतसंहिता दोनों की विषयवस्तु समाहित है। अतः जो जिज्ञासु उक्त दोनों संहिताओं का अध्ययन न कर सके उसके लिये यह एक उत्तम आयुर्वेद ग्रंथ है। वाग्भट ने ग्रंथ के समापन पर कहा है कि - 
अष्टाङ्गवैद्यकमहोदधिमन्थनेन योऽष्टाङ्गसङ्ग्रहमहामृतराशिराप्तः। 
तस्मादनल्पफलमल्पसमुद्यमानां प्रीत्यर्थमेतदुदितं पृथगेव तन्त्रम्।। अष्टांगहृदयम्, 6.14.80
अर्थात् - कायचिकित्सा आदि आठ अंगों वाले आयुर्वेदशास्त्ररूपी महासमुद्र का मंथन करने से मुझे पहले 'अष्ट्ङ्गसंहिता' रूपी महान् अमृत-राशि प्राप्त हुयी थी, उसी में से उसी के समान फल देने वाले इस 'अष्टांगहृदय' नामक स्वतंत्र तंत्र की रचना उनके लिए की गयी है, जो आयुर्वेदशास्त्र का विस्तृत अध्ययन कर पाने में असमर्थ हैं।। 

Saturday, November 18, 2017

जलवायु परिवर्तन और विश्व की चिन्तायें

 ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।। 
 “इस जगत् में जो कुछ है सब एक ही तत्त्व ईश्वर से व्याप्त है, अतः उनका त्याग के अनुसार भोग करें। अन्य किसी के धन आदि की इच्छा न रखें।“ कहने का तात्पर्य है कि जितने से आपकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाये उतना ही उपयोग करें। परन्तु आज मानव मन में प्रकृति के प्रति श्रद्धाभाव का नाममात्र भी शेष नहीं रह गया है त्याग की भावना मृतप्राय हो गयी है, एवं भोगवृत्ति बलवती हो गयी है। उपनिवेशीकरण एवं औद्योगीकरण के फलस्वरूप विगत शताब्दियों से प्रकृति के प्रत्येक तत्व का अन्धाधुन्ध दोहन हुआ है। परिणामस्वरूप वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन को लेकर चिन्तित है। यह मात्र एक समस्या नहीं अपितु यह अनन्त समस्याओं का समुच्चय है, जिसमें प्रत्येक समस्या परस्पर सम्बद्ध है।
जलवायु परिवर्तन:-
जलवायु परिवर्तन एक दीर्घावधिक घटना है। किसी भी स्थान के मौसम में जब लम्बी समयावधि तक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन अनुभव किया जाता है तो उसे जलवायु परिवर्तन कहते हैं। यह परिवर्तन मौसम की आन्तरिक प्रक्रियाओं अथवा मानवीय क्रियाकलापों के कारण हो सकता है। वर्तमान में इसका प्रमुख कारण मानवीय क्रियाकलाप ही हैं। इसके परिणाम अत्यन्त गम्भीर और विध्वंसकारी हो सकते हैं।  यद्यपि मानव में सदा से ही अपनें पर्यावरण को प्रभावित करने की प्रवृत्ति रही है, तथापि विगत १८वीं शताब्दी के मध्य में औद्योगिक क्रान्ति के आरम्भ से उसने प्रकृति का दोहन, शोषण कर पर्यावरण को उसके अनुकूलन क्षमता से कहीं अधिक प्रभावित किया है। जिसका दुष्परिणाम आज व्यापक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है। इंटर गवर्नमेण्टल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अनुसार मानवीय क्रियाकलापों के फलस्वरूप उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों के संकेन्द्रण में वृद्धि होती है, जो जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है, क्योंकि पृथ्वी के जलवायु नियन्त्रण में ग्रीन हाउस गैस प्रभाव की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। आईपीसीसी के चौथे मूल्यांकन प्रतिवेदन २००७ में संभावना व्यक्त की गयी है कि २०वीं शताब्दी के मध्य से पृथ्वी के औसत तापमान में आयी अधिकांश वृद्धि का कारण मानवीय क्रियाकलापों से उत्सर्जित उष्माशोषक गैसें हैं। विकास और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का अन्तःसम्बन्ध है। पूर्व औद्योगिक काल से ही ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। इसमें अधिकांश मात्रा कार्बन डाई ऑक्साइड की है। वर्ष १९७० से २००४ के मध्य इसमें ७० प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
वैश्विक ताप वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) जलवायु परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। कुछ वर्षों पूर्व तक इस शब्द का प्रचुर प्रयोग होता था, परन्तु अब इसकी तुलना में जलवायु परिवर्तन शब्द का प्रयोग बढ़ रहा है, जो यह इंगित करता है कि मात्र वैश्विक ताप में ही परिवर्तन नहीं हो रहा है, अपितु अन्य क्षेत्रों में भी परिवर्तन हो रहे हैं। वस्तुतः कुछ दशकों से मानवीय हस्तक्षेप के कारण होने वाला प्रतिकूल जलवायु परिवर्तन अब अपने दुष्परिणामों  सहित दृश्यमान हो रहा है। जीवाश्म ईंधनों के दहन, औद्योगीकरण, नगरीकरण, जनसंख्या वृद्धि, कृषि क्षेत्रों का फैलाव, निर्वनीकरण, आदि मानवीय गतिविधियों के कारण ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। जिसको समायोजित करना प्रकृति की क्षमता से परे है।
जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव:-
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण आज जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य, नदी अपवाह तन्त्र, समुद्री पर्यावरण, स्वच्छ जलापूर्ति आदि गम्भीर संकट में हैं। यह परिवर्तन न केवल किसी एक देश अपितु सम्पूर्ण पृथ्वी के लिये गम्भीर संकट है। इसके परिणामस्वरूप हिम स्खलन, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र के जल स्तर में तेजी से वृद्धि, संक्रामक रोगों में वॄद्धि, बाढ़, भूस्खलन, वर्षा, सूखा, आदि की प्रबल सम्भावना है। जलवायु परिवर्तन सम्पूर्ण विश्व के जैव विविधता के लिये एक खतरा है। इसका व्यापक प्रभाव कृषि क्षेत्र, जल संसाधन, मानव स्वास्थ्य, द्वीपीय जीवन, समुद्र तटीय अर्थव्यवस्थाओं, सामुद्रिक पर्यावरण, उदाहरणार्थ शैवालों की मृत्यु, ताप बढ़ने से मछलियों की मृत्यु, मछलियों के खाद्य प्लैंक्टन का अभाव, जीवोंकी प्रजातियों का विनाश, प्रकृति के साथ अनुकूलन क्षमता का ह्रास, वनस्पतियों का विनाश, उनके स्वरूप में परिवर्तन, उपलब्धता दर में ह्रास के साथ-साथ विकासशील देशों की जनता पर पड़ेगा। फलतः तटवर्ती नगर डूबने लगेगे, द्वीप भी अस्तित्त्व खोने लगेगे। इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाईमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 2007 की अपनी रिपोर्ट में साफ संकेत दिया था कि जलवायु परिवर्तन के चलते तूफानों की विकरालता में वृद्घि होगी। आंकड़ों पर यदि गौर किया जाए तो पता चलता है कि ऐसा घटित भी हो रहा है, 1970 के बाद उत्तरी अटलांटिक में ट्रोपिकल तूफानों में वृद्धि हुई है तथा समुद्र के जलस्तर और सतह के तापमान में भी वृद्घि हो रही है। इसके साथ ही ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 100 फीट पर ही तापमान पहले ही अपेक्षा कहीं अधिक गर्म हो गया है। ग्रीन हाउस गैसों को सीएफसी या क्लोरो फ्लोरो कार्बन भी कहते हैं। इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और वाष्प उपस्थित रहते है। ये गैसें तेजी से वातावरण में बढ़ती जा रही हैं और इसका नतीजा ये हो रहा है कि ओजोन परत के छेद का दायरा बढ़ता भी जा रहा है। ओजोन की परत सूर्य और पृथ्वी के बीच एक कवच की तरह काम करती है. इस कवच के कमजोर पडऩे का अर्थ है, पृथ्वी का सूर्य की भाँति गरम हो जाना। वर्तमान समय में ही स्थिति ये हो गयी है कि सामान्यतः ठंडे रहने वाले क्षेत्र भी गर्मी की मार से त्रस्त हैं। जहाँ कभी मूसलाधार वृष्टि हुआ करती थी, आज वहां सूखे की स्थिति है।
वैश्विक चिन्तायें:-
जलवायु परिवर्तन के सम्भावित खतरे को देखते हुए आज सम्पूर्ण विश्व में इस विषय पर शोध हो रहे हैं, वार्ताएं चल रही हैं,समितियाँ बनायी जा रही हैं, सम्मेलन हो रहे हैं , परन्तु वास्तविक और कारगर उपाय आजमाने पर प्रायः सभी देश मौन साधे हुए हैं विशेषकर विकसित देश,  जो औद्योगिक क्रान्ति के अग्रदूत रहे हैं, इस समस्या के निदान हेतु कारगर कदम उठाने के लिये विकासशील देशों पर दबाव डाल रहे हैं तथा उनसे उम्मीद करते है कि वे इस हेतु कुछ प्रयास करें। जबकि विश्व बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री जस्टिन लिन का कहना है कि विकासशील देश वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का एक तिहाई हिस्सा उत्सर्जित करते हैं लेकिन इसके बावजूद उन्हें जलवायु परिवर्तन का अस्सी फीसदी नुकसान उठाना पड़ेगा। विकसित देश जिनके विकास का फल है जलवायु परिवर्तन, वे इस पर ईमानदारी से कुछ करना नहीं चाहते। उन्हें भय है कि इससे उनका विकास रुक जायेगा। यद्यपि कुछ हद तक यह वास्तविकता भी है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के उपायों से उद्योग-धन्धे प्रभावित होंगे, तथापि परिवर्तन को रोकना समय की माँग तथा अपरिहार्य आवश्यकता भी है। आजकल एक बहस छिड़ी है कि विकास का एक मानक स्तर प्राप्त करने का हक सभी को है। ऐसे में विकासशील या अविकसित देशों से अपेक्षा करना कि वे अपने विकास कार्यों को पूर्णतः रोककर पर्यावरण की रक्षा करें, सरासर अन्याय व बेमानी लगता है। आज कई संगठन, कार्यक्रम तथा परियोजनाएं हैं, जो मानव और पर्यावरण के सम्बन्धों एवं परस्पर अन्तर्क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले परिणामों तथा उनके समाधान के लिये सम्भावित कारगर उपायों के विषय में सक्रिय रूप से अध्ययन कर रहीं हैं। इस विषय में पर्याप्त अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग मिल रहा है। भूमण्डलीय पर्यावरण क्षरण को रोकने, जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाये रखने के लिये सम्पूर्ण विश्व में समय-समय पर अनेक कार्यक्रम का आयोजन हुआ है तथा अनेक सन्धियाँ भी हुई हैं।
रियो सम्मेलन:-
१९९२ में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन ब्राजील के रियो दि जेनेरियो में किया गया। इसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण विकास  सम्मेलन या रियो सम्मेलन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें १५४ देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा जलवायु परिवर्तन कन्वेंशन (United Nations Framework Convention on Climate Change) पर हस्ताक्षर किये। इस कन्वेंशन का उद्देश्य निर्धारित समय सीमा के अन्दर वातावरण में ग्रीन हाउस गैस सांद्रणों के स्थिरीकरण का स्तर उस स्तर पर लाना था जिससे जलवायु प्रणाली के साथ होने वाले हानिकारक एंथ्रोपोजेनिक हस्तक्षेपों को रोका जा सके।
क्योटो प्रोटोकॉल:-
१९९७ में  क्योटो (जापान), में जलवायु परिवर्तन कन्वेंशन(UNFCCC) के पक्षकारों का तृतीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ। लम्बी चर्चा के बाद अन्ततः विकसित देशों द्वारा कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में ५.२ प्रतिशत की कटौती करने पर सहमति हुई। इस समझौते को क्योटो प्रोटोकॉल के नाम से जाना जाता है। विकसित देशों के वचनबद्धता के सुदृढ़ीकरण हेतु क्योटो प्रोटोकॉल अंगीकृत किया गया था। यह प्रोटोकॉल जलवायु परिवर्तन की समस्या का सामना करने हेतु अब तक का सबसे महत्त्वपूर्ण समझौता है। इसका लक्ष्य विकसित देशों के लिये परिणामी उत्सर्जन परिसीमन और न्यूनीकरण सम्बन्धी वचनबद्धताओं के साथ-साथ इन लक्ष्यों की समीक्षा को
सुविधाजनक बनाने तथा इनका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये कार्यतन्त्रों की व्यवस्था करना है। क्योटो प्रोटोकॉल में परिणामी उत्सर्जन परिसीमन और न्यूनीकरण वचनबद्धताओं वाले विकसित देशों को उनकी अपनी सीमाओं से बाहर के क्षेत्रों में होने वाली गतिविधियों से उपजे दायित्वों को अपेक्षाकृत कम लागत पर पूरा करने में सक्षम बनाने हेतु तीन तन्त्रों की स्थापना की गयी है। वे हैं- संयुक्त कार्यान्वयन, स्वच्छ विकास तन्त्र (सीडीएम) और उत्सर्जन व्यापार। इसमें विकासशील देश केवल स्वच्छ विकास तन्त्र के अन्तर्गत भाग ले सकते हैं। स्वच्छ विकास तन्त्र के अन्तर्गत एक विकसित देश किसी ऐसे विकासशील देश में ग्रीन हाउस गैस न्यूनीकरण संबंधी गतिविधियाँ प्रारम्भ करेगा, जहाँ ग्रीन हाउस गैस न्यूनीकरण परियोजना गतिविधियों पर अपेक्षाकृत कम लागत आयेगी। यह कार्यक्रम विकासशील देशों में सतत् और पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकियों को लागू करने में सहायता करता है और इस प्रकार औद्योगिक देशों को कम लागत पर अपने उत्सर्जन न्यूनीकरण दायित्वों को पूरा करने में सहायता करता है।
इसके अतिरिक्त जेनेवा में प्रथम विश्व जलवायु  सम्मेलन, ओजोन परत के संरक्षण हेतु  वियना कन्वेंशन, माण्ट्रियल प्रोटोकॉल,कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी करने के लिये टोरण्टो सम्मेलन,’संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (UNEP) तथा ’विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ (WMO) द्वारा जलवायु परिवर्तन के अध्ययन और विवरण प्रस्तुत करने के लिये जलवायु परिवर्तन अन्तरशासकीय पैनल (IPCC-intergovernmental panel on climate change) का गठन, हरितगृह गैसों की रोकथाम हेतु द्वितीय विश्व जलवायु सम्मेलन, आदि विभिन्न सम्मेलनों के माध्यम से समय-समय पर इस समस्या के समाधान का प्रयास किया गया है।
भारतीय प्रयास :-
भारत विश्व का मात्र ४ प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है, जो कि विश्व औसत का मात्र २३ प्रतिशत है जबकि यहाँ विश्व की १७ प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की हाल में हुई बैठक में भारत ने जोर देकर कहा है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या पैदा करने में उसकी कोई भूमिका नहीं रही है लेकिन इसके बावजूद वह इसके समाधान का हिस्सा बनेगा। भारत के पास व्यापक कानूनी ढ़ाँचा और कानूनी तन्त्र उपलब्ध है जिससे वह औद्योगिक विकास और शहरीकरण के फलस्वरूप तथा जनसंख्या वृद्धि, ग़रीबी और निरक्षरता  के कारण पर्यावरण सम्बन्धी गम्भीर चुनौतियों का सामना कर सके। यही नहीं भारतीय संविधान में पर्यावरण सुरक्षा हेतु विशेष उपबन्ध जोड़े गये हैं। जिसके तहत संविधान के अनुच्छेद ४८ए में यह उल्लेख किया गया है कि राज्य द्वारा देश की वन सम्पदा और वन्य जीवों की सुरक्षा के लिये पर्यावरण की सुरक्षा और उसका सुधार करने का प्रयास किया जायेगा। अनुच्छेद ५१(जी) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक के लिये वनों, झीलों, नदियों, वन्य जीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा करना और उसका सुधार करना तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया का भाव रखना आवश्यक बना दिया गया है।
भारत विकसित देशों को लगातार यह बताने का प्रयत्न कर रहा है कि वे पर्यावरण की दृष्टि से ठोस और अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को विकासशील देशों द्वारा सीमित सार्वजनिक प्रयोग हेतु अंतरित करें ताकि वे इस क्षेत्र को शीघ्र अपना सकें, उनका प्रसार कर सकें और उनको उपयोग में लायें तथा साथ ही यह भी अनुरोध किया है कि वे विकासशील देशों में वित्तीय संसाधनों का अंतरण भी करें। इसके साथ ही भारत ने विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन विषय पर पहल के लिये यूएनएफसीसीसी के अन्तर्गत अनुकूलन कोष और विशेष जलवायु परिवर्तन कोष के शीघ्र प्रयोग में लाये जाने की माँग भी की है।अतः विश्व समुदाय को इन जलवायु संबंधी आपदाओं के विनाशकारी प्रभाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके विनाशकारी प्रभाव की वजह से अनेक परिवारों और लोगों ने अपना सब कुछ गंवा दिया और अब वे महज टुकड़े चुनने के लिये बचे हुए हैं। इस अवस्था में विकसित देशों को अपने उत्सर्जन स्तर को कम करना चाहिये और इस क्षेत्र में हर बार होने वाले समझौतों को धता बताने से बाज़ आना चाहिये। हालाँकि यह सच है कि इस समस्या का वर्तमान में सर्वाधिक प्रभाव निर्धन देशों पर पड़ रहा है पर वह दिन दूर नहीं है जब विकास के उच्च पायदान चढ़ चुके विकसित देश भी इसकी गिरफ़्त में होंगे। आवश्यकता इस बात की भी है कि समस्त विश्व द्वारा आज इस सन्दर्भ में किये जाने वाले सम्मेलन, बैठक, वार्तायें आदि सब मात्र काग़ज़ों पर ही न रह जायँ, जैसा कि अब तक होता आया है, वरन् उनका गम्भीरतापूर्वक क्रियान्वयन भी हो।

Tuesday, February 16, 2016

राष्ट्रद्रोही अपने कुकृत्यों व करतूतों द्वारा JNU में पढ़ने आने वाली देश की प्रज्ञा का अपमान न करें और उसे बदनाम न करें

JNU आजकल राष्ट्रद्रोही गतिविधियों, कश्मीर के अलगाववाद व पाकिस्तान-परस्त नारों के कारण चर्चा में है। कुछ लोगों व गिरोहों की काली करतूत के कारण यह प्रतिष्ठान अपनी प्रतिष्ठा खो रहा है। #JNU वह प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान है जिसने देश को अनेक नीति-नियन्ता, विचारक, शिक्षक, विद्वान व प्रशासक दिये हैं। हमारे सैन्य अधिकारियों को भी JNU डिग्री देता है। राष्ट्र-विकास व राष्ट्र-प्रतिष्ठा के विविध क्षेत्रों में इस विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यद्यपि यहाँ लगभग हल काल में कुछ राष्ट्रद्रोही व्यक्ति व गिरोह रहे हैं परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि पूरा विश्वविद्यालय ही द्रोही व विध्वंसात्मक है। यहाँ से अनेक ऐसी प्रतिभायें भी प्रसूत हुयी हैं जिन्होंने देश का गौरव बढ़ाया है। अनेक ऐसे लोग भी हुये हैं जो यहाँ विद्यार्थी जीवन में वामपंथ के तिलिस्म में फंसे तो जरूर पर परिसर से बाहर निकलते ही उस तिलिस्म से निकलकर राष्ट्रसेवा में लग गये। अनेक लोग हैं जिन्हें राष्ट्रीय अस्मिता का प्रत्यभिज्ञान हुआ है।
#JNU भारत का एक ऐसा विश्वविद्यालय है जहाँ आप न्यूनतम व्यय पर गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा सहजता से प्राप्त कर सकते हैं। #JNU वह संस्थान है जहाँ एक विद्यार्थी को तब प्रवेश मिलता है जब वह अपने स्तर के हजारो विद्यार्थियों में स्वयं को प्रवेश- परीक्षा द्वारा उत्तम सिद्ध करने में सफल होता है। #JNU एक ऐसा प्रतिष्ठान है जहाँ सोच व अभिव्यक्ति का नया आयाम व क्षितिज खुलता है (इसी अभिव्यक्ति का सहारा ले कुछ लोग अपना उल्लू भी सीधा करते हैं जैसे सम्प्रति प्रकरण में किया पाकिस्तान-परस्त बनकर) परन्तु अभिव्यक्ति की मर्यादित स्वतंत्रता व्यक्तित्व विकास का सहज व उत्तम अंग है।
#JNU की विशेषताएं उसकी न्यूनताओं से कहीं ऊँची हैं। पर एक बात और है कि विशेषताओं की ओट में राष्ट्रद्रोह को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता।
#JNU की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए,उसकी प्रतिष्ठा का सम्मान करते हुए आज वह समय है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाले लोगों व गिरोहों का पर्दाफाश हो। राष्ट्रद्रोहियों का चेहरा देश के सामने आ गया है। #JNU की भूमि इनसे साफ हो। आज स्वच्छ JNU अभियान की आवश्यकता है। अभियान शुरू हो गया है बस अपेक्षा है कि सभी विचारधाराओं के सँारे सीकचों से बाहर आकर राष्ट्रवाद के साथ खड़े हों क्योंकि राष्ट्र सबसे ऊपर होता है।
दुर्भाग्य व चुल्लू भर पानी में डूबने का विषय है कि JNU के शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग इन गतिविधियों के साथ खड़ा नजर आता है। यह विचारणीय है कि जब उनकी संवेदना राष्ट्र के साथ नहीं है तो क्या उनका कोई उत्तरदायित्व राष्ट्र के साथ होगा क्या? आज यह प्रश्न पूछने की जरूरत है JNU के उन शिक्षकों से जो भारतीय अर्थव्यवस्था का करोड़ो डकारते हैं( जो कि आम जनता के खून पसीने की कमाई है ) कि उनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा क्या है? वे किसके साथ खड़े हैं -राष्ट्रद्रोह के साथ या राष्ट्रवाद के साथ?
अफजल के समर्थन में नारों एवं उसे शहीद घोषित करने की बात को दबाने के लिये jnu के विद्यार्थियों व देश की जनता का ध्यान विषय से हटाने के लिये अब समस्त वामपंथी एकसाथ हो मदारी बन कलाबाज़ी दिखाने लगे हैं और अन्य बातों पर बहस खीचने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं। अपना चेहरा उजागर होने से इतना घबराये हुये हैं कि उलूल-जुलूल-फिजूल पर उतर आये हैं और उलूक बन बचने का आलोक खोज रहे हैं।
CPI नेता डी. राजा की सुपुत्री अपराजिता राजा स्पष्ट रूप से वीडियो में देखी जा सकती हैं इसलिये राजा इतना घबराये व बौखलाए कि बदहवास हो दल बल समेत jnu की ओर दौड़ पड़े। अब उन्हें अपने व अपनी पार्टी के विचारधारा के अस्तित्व का संकट सताने लगा है। अब पता चल गया है कि किस ओर हैं वो। पूरे वामपंथ की मिलीभगत व गलबँहियाँ सार्वजनिक हो गयी। भारत में वामपंथ भारत विरोधी गिरोहों की फैक्टरी है यह बात भी उजागर हुई।
सब सहा जा सकता है। सभी बातो को क्षमा किया जा सकता है पर राष्ट्रद्रोह अक्षम्य है। यह अपराध नहीं जघन्य पाप है जिसका न प्रायश्चित है न क्षमा।
अत: जो इस विषय पर अपनी अपनी बात रख रहे हैं। वे दो महत्वपूर्ण बातें ध्यान रखें कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व मानवाधिकार की आड़ में राष्ट्रद्रोह की इजाजत नहीं है। यह स्वीकार न होगा इसका कड़ा प्रतिकार होगा। दूसरा का चन्द द्रोहियों, गिरोहों, गिरहकट्टों, राष्ट्र के जेबकतरों, अलगाववादियो, आतंकवादियों, चापलूसों, चाटुकारों, स्वार्थियों, ढोंगियों, विषधर व्यालों, मातृहन्ता बिच्छुओं के कारण jnu की विद्वत् परम्परा को बदनाम न करें न होने दें। यह वहाँ के कार्यकर्ताओं की राष्ट्रीय चेतना का ही परिणाम है कि राष्ट्रद्रोह के इस कुकृत्य व करतूत को राष्ट्र जान पाया और राष्ट्रद्रोहियों व अलगाववादियों का चेहरा उजागर हुआ। #ABVP


#CPM का चरित्र और #JNU में राष्ट्रद्रोह: एक संबन्ध

सन् 2000 की बात है उस समय पश्चिम बंगाल में #CPM का गुण्डाराज हुआ करता था। उसने रामकृष्ण मिशन को भी गुण्डागर्दी का शिकार बनाया। वे चाहते थे कि मिशन के शिक्षण-संस्थाओं के संचालक संत न होकर कम्युनिस्ट हों और वहाँ कम्युनिस्ट शिक्षकों की नियुक्ति हो। इसके लिये उन्होंने संतो को डरा-धमकाया भी। जब डराने से बात नहीं बनी तब रामकृष्ण मिशन विद्यालय को नगरपालिका द्वारा प्राप्त होने वाले पानी को बन्द करवाकर विद्यार्थियों व शिक्षकों को प्यासा रहने पर मजबूर किया। समाचार पत्रों के विरोध के कारण मार्क्सवादियों को थोड़ा पीछे हटना पड़ा।
रामकृष्ण मिशन के प्रसिद्ध नरेन्द्रपुर विद्यालय में जिस समय स्वामी लोकेश्वरानन्द जी अध्यक्ष थे, उस समय मार्क्सवादियों ने वहाँ कर्मचारियों की हड़ताल करवायी। विद्यार्थियों व शिक्षकों का आवासीय परिसर होंने के कारण भोजन-पानीए बन्द हो गया।……….परन्तु विद्यार्थियों और शिक्षकों ने उनके मंसूबों को पूरा नहीं होंने दिया और वे परिसर तथा छात्रावासों में डटे रहे। स्वयं हर प्रकार का काम किया और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति की। समाज ने भी यथोचित सहयोग दिया। इस प्रकार CPM की गुण्डा सरकार का रामकृष्ण मिशन पर कब्जा जमाने व स्वामी विवेकानन्द के स्वप्नों को ध्वस्त करने का सपना अधूरा रह गया।
उपर्युक्त घतना का उल्लेख मैं यहाँ इसलिये कर रहीं हूँ कि इससे वामपंथ के चरित्र का पता चलता है। जिसका प्रमुख चरित्र है डराना-धमकान-दबाव बनाना और जब इससे भी बात न बने तब हड़ताल करवाना। यदि हड़ताल भी निष्प्रभावी हो तो उस तरह कत्ल का ताण्डव मचाना जिस तरह केरल में #ABVP #RSS के कार्यकर्ताओं व अपने विरुद्ध आवाज उठाने वाले हरएक व्यक्ति के साथ मचाया है इन्होंने।
कल हड़ताल होंने जा रही है #JNUTA की हड़ताल। जिस हड़ताल में JNUTA का दावा है कि सभी शिक्षक व विद्यार्थी भाग लेंगे। हालांकि इस दावे में इतनी सच्चाई नहीं है। JNU का विद्यार्थी अभी स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा होगा (खासकर वे विद्यार्थी जो कम्युनिस्ट संगठनों, पार्टियों और गिरोहों के खुलेतौर पर या परोक्षरूप से समर्थक शिक्षकों के निर्देशन में अध्ययन-शोध कर रहे हैं।)। इसलिये एक ज्ञात-अज्ञात भय के कारण विद्यार्थियों की एक संख्या इस बन्द में अवश्य भाग ले सकती है पर वह सहभागिता निष्ठापूर्वक कम दबाव के चलते अधिक होगी।
आज JNU के वामपंथी संगठन और गिरोह, जिनके ही करतूतों से वास्तव में विश्वविद्यालय बदनाम हो रहा है और उसके मेधावान् विद्यार्थियों को अपमान का घूँट पीने पर मजबूर होना पड़ रहा है, मूल बात से ध्यान हटाने के लिये किसी भी हद पर उतर आने को बेताब हैं। आज ये और इनके आका लोग झूठों का पुलिन्दा बना-बकाकर विलाप से लेकर प्रलाप करने पर आमादा हैं। अपने इसी वाक्जाल में फँसाकर इन्होंने देश को अनेक बार बर्बाद करने की साजिश रची है। बंगाल को कंगाल किया है और इन्हीं हथकण्डों और विभिन्न मुखुटों के कारण इतने टुकड़ों में बंटे हैं कि इन्हें स्वयं अपने टुकड़ों और छद्म मुखौटों को याद रखने के लिये रजिस्टर तैयार करना पड़ा होगा।
ये फिर एक बार फेक, झूठा और दिखावे का अमोनियम क्लोराइड अपने नेत्रों से बहाने पर आमादा हैं सिर्फ इसलिये कि देश की जनता का ध्यान JNU में घटी राष्ट्रद्रोह की घटना से हटे और फिर ये अपने मजे में दशकों तक जनता के खून-पसीने की कमाई पर ऐश करें तथा अपने कुकृत्यों व करतूतों द्वारा JNU में पधने आने वाली देश की प्रज्ञा का अपमान करें और उसे बदनाम करें।

वामपंथ के कुपंथ पर शिकंजा

वामपंथियों और उनके द्वारा समर्थित गिरोहों द्वारा हमेशा से #JNU में राष्ट्रद्रोही गतिविधियाँ होती रही हैं। यह कोई नयी बात नहीं है। देश के प्रतिभावान् विद्यार्थी जो अच्छी शिक्षा हेतु इस विश्वविद्यालय में प्रवेश करते हैं उनको उनके मार्ग से भटकाकर, बरगलाकर, नशेड़ी बनाने और कुछ हद तक राष्ट्रद्रोही बनाने का कार्य भी ये वामपंथी समूह और संगठन करते रहते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हेम मिश्रा है, जिसे महाराष्ट्र पुलिस ने नक्सलवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आधार पर गिरफ्तार कर जेल भेजा था।
2010 में जब दन्तेवाड़ा में नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या की गयी थी तब इन्हीं गिरोहों ने गोदावरी छात्रावास के सामने जश्न का आयोजन किया था। उस समय भी इस बार की भाँति #abvp ने इनका कड़ा प्रत्युत्तर दिया था और इनके इस कुकृत्य के विरोध में JNU के आमछात्र सड़क पर उतरे थे।
इस बार इनके इस राष्ट्रद्रोही कार्य में नयी बात यह है कि इनके विरुद्ध ऑडियो-विजुवल प्रमाण हैं। मीडिया भी अपेक्षाकृत सकारात्मक भूमिका निभा रही है। पूरे देश में सकारात्मकता की लहर है। सबसे बड़ी बात की इस समय देश में कांग्रेस की रीढ़विहीन सरकार नहीं है अपितु एक सकारात्मक सोच वाली राष्ट्रवादी सरकार है। इन्हीं सब कारणों से इन देशद्रोहियों पर शिंकजा अब कसने लगा है। यह बहुत ही सार्थक पहल है। ऐसा २-३ दशक पूर्व ही हो जाना चाहिये था।